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सृष्टि रचयिता : नारी      

देखे हैं अनेक रूप

छांव हो कि धूप

थकी नहीं, रुकी नहीं

स्‍वयं के लिए कभी जी ही नहीं

वह तो जननी है

सृष्टि की रचयिता

संवेदना की मूरत

धूप-तपन, सर्दी-गर्मी के थपेड़ों को सहकर

फिर भी खुश रहकर 

सृष्टि में भरती है श्रृंगार

कभी नहीं करती प्रतिकार

लेकिन, अबला नहीं है नारी

सबल, शक्तिवान है

मानव जाति का अभिमान है 

राह दिखाती पगडंडी है

कभी दुर्गा तो कभी चंडी है

पर, मैं समझ नहीं पाती

नारी क्‍यों बनी सीता, द्रौपदी, गांधारी

आखिर क्‍या थी उसकी लाचारी

क्‍यों नहीं शिव धनुष उठाने वाली सीता ने 

मार गिराया रावण को,

द्रौपदी क्‍यों स‍हती रही 

कौरवों से अपमान,

गांधारी ने बंद कर ली आंखें 

अन्‍याय को देख,

इतिहास बदल सकती थी वो 

छल का सबब जान.

क्‍यों नहीं बनती हर नारी?

रानी दुर्गावती या रानी लक्ष्‍मीबाई

क्‍या वो अपना परिवार चलाने को,

सबमें सामंजस्‍य बनाने को

सहती रहती है सब कुछ

यदि वह भी प्रतिकार करे, तकरार करे 

तो बिगड़ जायेगा परिवार का संतुलन 

हॉं, बिगड़ जायेगा परिवार का संतुलन

डॉ. शशिकला पटेल ,प्रसिद्ध लेखिका मुंबई

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