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मां की आराधना में नारी

यह कविता नारी के महत्व, उसकी शक्ति और समाज में उसके सम्मान की आवश्यकता पर केंद्रित है। लाल चुनरी से सजा माँ का दरबार और नौ दिन की पूजा नारी की भक्ति और महिमा को दर्शाते हैं। कविता यह बताती है कि सृष्टि नारी के बिना नहीं चलती और जहाँ नारी का अपमान होता है, वहाँ पूजा-पाठ व्यर्थ है। विता में यह संदेश भी है कि नारी को कभी कमजोर नहीं बनना चाहिए। यदि उसके आत्म-सम्मान पर चोट पहुँचती है, तो उसे काली या चंडी के रूप में दुष्टों का विनाश करना चाहिए। साथ ही यह भी उजागर किया गया है कि आज भी कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियाँ जारी हैं और बेटियों की सुरक्षा समाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। कुल मिलाकर, यह कविता नारी सम्मान, शक्ति, साहस और जागरूकता का संदेश देती है।

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सृष्टि रचयिता : नारी      

नारी को अबला कहना उसके अस्तित्व के साथ अन्याय है। वह सृष्टि की रचयिता, संवेदना की मूरत और असीम शक्ति की प्रतीक है। धूप, सर्दी, गर्मी और जीवन के हर थपेड़े सहकर भी वह संसार में सौंदर्य और संतुलन भरती है। कभी दुर्गा, कभी चंडी, वह मानव जाति का अभिमान है। फिर भी इतिहास में सीता, द्रौपदी और गांधारी जैसी अनेक नारियां अन्याय सहने को विवश क्यों हुईं? क्या परिवार का संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी सिर्फ उसी की है? सवाल यही है कि हर नारी रानी लक्ष्मीबाई या रानी दुर्गावती की तरह साहसी और प्रतिकार करने वाली क्यों नहीं बन पाती।

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