
संध्या श्रीवास्तव, प्रसिद्ध कवयित्री
लाल रंग की चुनरी से सजा रहा है माँ का दरबार।
हर्षित हुआ मन, पुलकित हुआ संसार।
नौ दिन की पूजा—हर रूप के माँ को,
लेकर मन में भक्ति का भाव।
सृष्टि नहीं चलती नारी के बिना;
वही है जगत की सृजनहार।
नारी के हर रूप की महिमा है बड़ी अपार।
सुख-समृद्धि कभी नहीं टिकती
होता है उस घर में जहाँ नारी का अपमान।
होता नहीं उस घर में जहाँ नारी का सम्मान
वहाँ देवी पूजन व्यर्थ है; वहाँ सब पूजा-पाठ व्यर्थ है।
पूर्ण हुई आराधना माँ की—कन्या पूजन के उपरांत भी,
फिर भी कन्या भ्रूण हत्या आज भी बंद नहीं हुई है।
आज भी माँ के दरबारों में मुरादें माँगी जाती हैं.
बेटों के जन्म की आशा लेकर।
बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं हमारी यह इतिहास लिखा जाएगा।
माँ ने धर कर हर रूप को दिया—हर नारी को यही संदेश:
“कभी भी मत बनना कमजोर; जब लगे तुम्हारे आत्म-सम्मान पर चोट—
दुष्टों का संहार कर दो; तब काली का अवतार ले लो;
चंडी का रूप धारण कर लो; बुराई का विनाश कर दो।”
सृष्टि नहीं चलती नारी के बिना—
दे दो यह संदेश सबको।
