वो पुरुष

वो भी इंसान है… बस कह नहीं पाता।

डॉ. रुपाली गर्ग लेखिका, मुंबई

जिसके कंधों पर दुनिया टिकी है,
और दिल में एक अनकही थकान बसी है ,
सुबह उम्मीदों के जूते पहनकर निकलता,
शाम को ज़िम्मेदारियों से भरा लौटता।

हँसी ओढ़ लेता है चेहरे पर,
और अपने दुख जेब में रख लेता
उसे सिखाया गया मज़बूत रहो,
टूटना कमजोरी है, यह मत कहो।

इसलिए आँसू भी इजाज़त माँगते हैं,
आँखों में आकर भी रुक जाते हैं।

बेटा बनकर सपने ढोता है,
पिता बनकर छाँव बन जाता है,
पति बनकर वादे निभाता है,
भाई बनकर ढाल बन जाता है।

खुद के लिए कम,
दूसरों के लिए ज़्यादा जीता है,
वो पुरुष जो सबका सहारा है,
पर अक्सर खुद को अकेला पाता है।

अगर कभी वो चुप है,
तो समझ लेना
वो थका है, कमज़ोर नहीं।

लेखिका के बारे में-
डॉ. रुपाली गर्ग
एक शिक्षिका, लेखिका और साहित्य साधिका हैं, जिन्होंने बरेली विश्वविद्यालय से पीएचडी तथा चेन्नई से MBA किया है।वे पिछले 2 वर्षों से लेखन में सक्रिय हैं और अब तक 300 से अधिक रचनाओं का सृजन कर चुकी हैं।
उनकी लेखनी में स्त्री, जीवन, वियोग और अनुभवों की गहराई झलकती है, साथ ही उन्हें जासूसी और दर्शनशास्त्र आधारित साहित्य पढ़ना विशेष रूप से पसंद है।
उनकी रचनाएँ 500+ साझा संकलनों व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, तथा वे कई साहित्यिक सम्मेलनों की गरिमा बढ़ा चुकी हैं. साथ ही उनकी 2 पुस्तकें प्रकाशित हैं और वे विभिन्न साहित्यिक मंचों पर उपाध्यक्ष एवं सह-संस्थापिका के रूप में सक्रिय हैं।

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