स्त्री होने का अभिमान
स्त्री के अस्तित्व, सम्मान, अधिकार और आत्मबोध को केंद्र में रखती यह कविता बदलते समाज में स्त्री के अपने मान और स्त्रीत्व को पहचानने की आवश्यकता पर सवाल उठाती है.

स्त्री के अस्तित्व, सम्मान, अधिकार और आत्मबोध को केंद्र में रखती यह कविता बदलते समाज में स्त्री के अपने मान और स्त्रीत्व को पहचानने की आवश्यकता पर सवाल उठाती है.
यह कविता समाज में व्याप्त दहेज प्रथा, एसिड अटैक, महिलाओं के प्रति हिंसा और दोहरे मापदंडों पर तीखा प्रश्न उठाती है। साथ ही यह पुरुषों को राम और कृष्ण जैसे आदर्शों का अनुसरण कर नारी सम्मान की रक्षा करने का संदेश देती है।
“मेरी बेटियों” केवल विवाह पर लिखी कविता नहीं, बल्कि बेटियों के आत्मसम्मान, स्वतंत्र पहचान और रिश्तों में गरिमा की बात करने वाली संवेदनशील अभिव्यक्ति है। यह कविता कन्यादान, सामाजिक अपेक्षाओं और समझौते की सीमाओं पर प्रश्न उठाते हुए बेटियों को यह संदेश देती है कि किसी भी रिश्ते से पहले उनका जीवन और सम्मान महत्वपूर्ण है।
“पराया धन” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि वह सामाजिक सोच है जो बेटियों को अपने ही घर में अस्थायी महसूस कराती है। यह लेख स्त्री की स्वतंत्र चेतना, आत्मसम्मान और भावनात्मक सबलता की आवश्यकता पर गंभीर प्रश्न उठाता है और समाज से आग्रह करता है कि बेटियों को संपत्ति नहीं, स्वतंत्र व्यक्तित्व की तरह देखना सीखे।
शादी केवल नए रिश्तों की शुरुआत नहीं, बल्कि एक स्त्री के लिए नए संघर्षों की भी शुरुआत हो सकती है। यह लेख बहू के भावनात्मक संघर्ष, अपेक्षाओं और ससुराल व्यवस्था पर जरूरी सवाल उठाता है।
यह लेख दर्शाता है कि किस तरह एक लड़की शादी के बाद बेटी से बहू बन जाती है, और कैसे समय आने पर उससे बेटी जैसा व्यवहार अपेक्षित किया जाता है। यह लेख रिश्तों में सच्चे अपनापन और समान सम्मान की आवश्यकता पर भावनात्मक प्रकाश डालता है।
संगठन संरचना व कार्यप्रणाली पर हुआ मंथन नई दिल्ली से प्रेरणा बुडाकोटी की रिपोर्ट नई दिल्ली | स्त्री शक्ति संगठन द्वारा 31 जनवरी (शनिवार) को “संगठन संरचना एवं कार्यप्रणाली” विषय पर एक विचार गोष्ठी कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का नेतृत्व संगठन की मुख्य अध्यक्षा ममता शर्मा ने किया। गोष्ठी में विभिन्न आयु वर्ग…
यह कविता नारी की स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और अधिकारों की बुलंद आवाज़ है। समाज में स्त्री को जागीर समझने की मानसिकता पर तीखा प्रहार करती यह रचना समानता और सम्मान की माँग करती है।
जब शब्द हथियार बन जाएँ और फुसफुसाहटों में ज़हर घुलने लगे, तब एक स्त्री का सच बोलना केवल आत्मरक्षा नहीं रहता, वह समाज को आईना दिखाने का साहस बन जाता है। अपनी कहानी कहकर वह न सिर्फ़ स्वयं को मुक्त करती है, बल्कि उन अनकही चुप्पियों को भी तोड़ देती है, जिनमें अपराध पनपते हैं।
“आधुनिक जीवन की भागदौड़, अहंकार, संवाद की कमी और संस्कारों से दूर होती नई पीढ़ी इन सबने विवाह जैसे पवित्र बंधन को कमजोर कर दिया है। परिवार का ताना-बाना बिखर रहा है, संयुक्त परिवार टूट चुके हैं और रिश्तों में धैर्य व समझदारी कम होती जा रही है। यही कारण है कि विवाह-विच्छेद बढ़ते जा रहे हैं।”