सृष्टि रचयिता : नारी      

नारी को अबला कहना उसके अस्तित्व के साथ अन्याय है। वह सृष्टि की रचयिता, संवेदना की मूरत और असीम शक्ति की प्रतीक है। धूप, सर्दी, गर्मी और जीवन के हर थपेड़े सहकर भी वह संसार में सौंदर्य और संतुलन भरती है। कभी दुर्गा, कभी चंडी, वह मानव जाति का अभिमान है। फिर भी इतिहास में सीता, द्रौपदी और गांधारी जैसी अनेक नारियां अन्याय सहने को विवश क्यों हुईं? क्या परिवार का संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी सिर्फ उसी की है? सवाल यही है कि हर नारी रानी लक्ष्मीबाई या रानी दुर्गावती की तरह साहसी और प्रतिकार करने वाली क्यों नहीं बन पाती।

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“कब कह पाएंगे दिल की बात”

सोनम और राजा की कहानी ने एक बार फिर ये सवाल उठाया है — क्या हमारे समाज में किसी लड़की को सच कहने की आज़ादी है? जब रिश्तों में संवाद की जगह चुप्पी ले लेती है, तब वही चुप्पी कभी किसी की जान ले सकती है… और कभी किसी की जान बचा भी सकती है।

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“देह, निर्णय और दरारें”

पितृसत्ता केवल सामाजिक ढांचा नहीं, बल्कि एक गहराई से जड़ें जमाई मानसिक संरचना है जो पुरुष को सत्ता और स्त्री को ‘अन्य’ मानकर उसके श्रम, निर्णय और देह पर नियंत्रण स्थापित करती है। यह लेख पितृसत्ता की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक और आधुनिक सामाजिक परतों को खोलते हुए यह सवाल उठाता है कि आखिर हम ‘मनुष्य’ से ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ में कब और कैसे बंट गए?

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