
मीनू राजेश शर्मा, प्रसिद्ध लेखिका, रायपुर (छत्तीसगढ़)
हमारी भारतीय संस्कृति में 16 संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार विवाह है।विवाह एक पवित्र बंधन माना गया है, जिसका महत्व आज की युवा पीढ़ी सही अर्थों में समझ नहीं पा रही है। धीरे–धीरे इस पवित्र बंधन का हल्का सा मज़ाक बना दिया गया है।
पुरातन काल में, जब लड़का–लड़की बहुत कम आयु के होते थे, उनका विवाह कर दिया जाता था।उसका एक कारण यह भी था कि उस उम्र में वे कच्चे घड़े की तरह होते थे. जिन्हें जैसा चाहो, सांचे में ढाला जा सकता था। घर के बड़े-बुज़ुर्ग अपनी परंपरा, संस्कार और सभ्यता के अनुसार उन्हें सहज ही अपने घर-परिवार में ढाल लेते थे। कम आयु होने के कारण, लड़कियाँ भी आसानी से सीख लेती थीं और ससुराल में रच-बस जाती थीं।
आज विवाह अधिक उम्र में होते हैं जब लड़का और लड़की पढ़-लिखकर पूर्ण रूप से परिपक्व हो चुके होते हैं। समान शिक्षा, समान नौकरी, समान महत्वाकांक्षाएँ… कभी-कभी यही बराबरी का भाव अहंकार के टकराव में बदल जाता है।
यह भी विवाह-विच्छेद का एक बड़ा कारण है।
परिवारिक ढांचे का बदलना
संयुक्त परिवार टूट चुके हैं।पहले बच्चों को दादा-दादी, नाना-नानी तथा अन्य बड़े-बुज़ुर्गों से संस्कार मिलते थे.धर्म, संस्कृति, बड़ों का सम्मान, छोटों से प्रेम, और परिवार का महत्व।अब एकल परिवारों में यह वातावरण नहीं मिल पाता।
चाचा–ताऊ–बुआ–मौसी के बच्चे भी पड़ोसी जैसे हो गए हैं।अकेलापन बढ़ रहा है, और पति-पत्नी दोनों अपने-अपने कार्यों में इतने व्यस्त हो गए हैं कि एक-दूसरे के साथ समय ही नहीं बिता पाते, और संवाद की कमी से दूरी बढ़ जाती है।जब पति या पत्नी किसी और के साथ सामान्य बातचीत करता है तो शक, आरोप और विवाद जन्म लेते हैं.जो अंततः संबंधों को तोड़ देते हैं।
माता-पिता का हस्तक्षेप
पहले माता-पिता बेटी की शादी के बाद उसके घर-परिवार में ज़रूरत से अधिक हस्तक्षेप नहीं करते थे। बेटी कोई समस्या बताए तो उसे समझाते थे, संभालते थे, और परिवार को साथ रखने की सीख देते थे। आज कई माता-पिता (सभी नहीं) तुरंत बेटी को घर छोड़कर आने को कह देते हैं, जिससे स्थिति और बिगड़ जाती है।
कानून का दुरुपयोग
लड़कियों के संरक्षण के लिए बने कानूनों का कई बार कुछ लोग गलत फायदा उठाते हैं. घरवालों को जेल भिजवाना, अनावश्यक शिकायतें करना, ये सब भी वैवाहिक जीवन में तनाव और टूटन का कारण बनते हैं।
पुरुषों की गलतियां भी कम नहीं
यह कहना भी उचित नहीं कि गलती सिर्फ लड़कियों की है। आज कई पुरुष भी बुरी आदतों, नशे, या ग़लत व्यवहार के कारण
पत्नी को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करते हैं। इससे भी विवाह टूटते हैं।
संस्कारों का क्षय
युवा पीढ़ी में धैर्य, समझदारी, और संस्कार की कमी दिखने लगी है।
उन्हें हमारे धार्मिक ग्रंथों का ज्ञान मिलना चाहिए.राम का त्याग, पांडवों का सत्य के मार्ग पर चलना,सीता का धैर्य, उर्मिला का इंतजार, द्रौपदी का संघर्ष, अहिल्या और वृंदा की दृढ़ता इन सबमें परिवार, निष्ठा और संबंधों की रक्षा का सार छिपा है।
पहले भारतीय नारी को इसलिए पूजनीय माना गया क्योंकि वह विपरीत परिस्थितियों में भी परिवार को साथ लेकर चलती थी।
पर आज की पीढ़ी धीरे-धीरे अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों से दूर हो रही है।चाहे लव मैरिज हो या अरेंज मैरिज,
शादी टिकने की संभावना अब पहले जैसी नहीं रही। बहुत-सी शादियाँ कुछ ही वर्षों में टूट जाती हैं।
समाधान
इसलिए हर माता-पिता से विनम्र अनुरोध है कि अपने बच्चों को बचपन से ही संस्कार, संस्कृति, धर्म, परंपरा और परिवार का महत्व सिखाएँ। उन्हें जीवन, संबंधों और त्याग का अर्थ समझाएँ, ताकि वे गलत राह पर न भटकें और अपने वैवाहिक जीवन को समझदारी, धैर्य और प्रेम से निभा सकें।

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