साड़ी में खड़ी एक बहू, पीछे धुंधली पारिवारिक पृष्ठभूमि, चेहरे पर मिश्रित भावनाएँ

बेटी से बहू कब बन गई…?

यह लेख दर्शाता है कि किस तरह एक लड़की शादी के बाद बेटी से बहू बन जाती है, और कैसे समय आने पर उससे बेटी जैसा व्यवहार अपेक्षित किया जाता है। यह लेख रिश्तों में सच्चे अपनापन और समान सम्मान की आवश्यकता पर भावनात्मक प्रकाश डालता है।

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रिज़ोर की अंतिम रानी श्रीमती शशि सिंह की स्मृति में श्रद्धांजलि

रिज़ोर की अंतिम रानी

उत्तर प्रदेश के एटा जिले की ऐतिहासिक रिज़ोर रियासत की अंतिम रानी श्रीमती शशि सिंह अपने विद्वत्ता, समाजसेवा और उदार व्यक्तित्व के लिए जानी जाती थीं. सोलहवीं पुण्यतिथि पर उन्हें परिवार और लाइव वायर न्यूज़ की ओर से यह भावभीनी श्रद्धांजलि समर्पित है, जो बुजुर्गों के संस्कार, दादी के महत्व और विरासत में मिले मूल्यों को याद करती है.

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अकेली वृद्ध माँ बैठी हुई, आँखों में आँसू और मन में पीड़ा, सामाजिक उपेक्षा का प्रतीक

क्यों वृद्धाश्रम में जाऊँ

यह कविता उस माँ की पीड़ा को स्वर देती है, जिसने जीवन भर अपनी संतान को सींचा, सँवारा और बड़ा किया, लेकिन अंत में उसी से वृद्धाश्रम जाने का आदेश मिला। यह रचना समाज से एक करुण सवाल पूछती है क्या माँ का अब कोई ठौर नहीं?

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माँ तो माँ होती है…

माँ का साथ शब्दों का मोहताज नहीं होता। कभी वह धूप में छाता बन जाती है, तो कभी जीवन की भीड़ में सहारा। उम्र भले ही शरीर पर अपना असर छोड़ दे, पर माँ की मौजूदगी वही सुकून देती है. निःशब्द, निःस्वार्थ और पूरी तरह सुरक्षित। माँ के साथ बिताया हर पल स्मृति बनकर जीवन भर साथ चलता है

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पहले झगड़े थे, आज दूरी

हर इंसान अलग है उसकी सोच, सहने की क्षमता, बोलने का तरीका और चुप्पी की भाषा भी अलग होती है। फिर भी हम एक-दूसरे में खामियाँ खोजने लगते हैं और यही खामियाँ धीरे-धीरे रिश्तों में दूरी बना देती हैं। आज परिवार छोटे हो गए हैं, लेकिन दिलों के फासले बढ़ गए हैं। जहाँ पहले प्रेम और सम्मान झगड़ों पर भारी पड़ते थे, आज अहंकार और असहिष्णुता रिश्तों को तोड़ रही है। साथ रहते हुए भी अकेले हो जाना, शायद हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है।

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“क्यों टूट रहे हैं रिश्ते?

“आधुनिक जीवन की भागदौड़, अहंकार, संवाद की कमी और संस्कारों से दूर होती नई पीढ़ी इन सबने विवाह जैसे पवित्र बंधन को कमजोर कर दिया है। परिवार का ताना-बाना बिखर रहा है, संयुक्त परिवार टूट चुके हैं और रिश्तों में धैर्य व समझदारी कम होती जा रही है। यही कारण है कि विवाह-विच्छेद बढ़ते जा रहे हैं।”

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दुर्गा.. 

दया और माया दो बहनें थीं। दया माँ दुर्गा की परमभक्त थी और अपने घर का पूरा काम संभालती थी, जबकि माया और उसका पति माधो आरामतलब और चालाक थे। दया और उधो की शादी हुई और उनके घर में छः बेटियाँ थीं।
नवरात्र के दिन, दया और उधो की साधारण साधना और भक्ति के बीच, उधो ने रास्ते में एक नवजात बच्ची को पाया, जिसे दया ने अपने घर ले जाकर गोद में लिया। दया ने उसे ‘दुर्गा’ नाम दिया और बिना सामग्री के ही पूजा-अर्चना की।
कुछ दिनों में घर की हालत सुधर गई और महानवमी की रात, बच्ची अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुई। देवी दुर्गा ने माधो को उसकी क्रूरता का पाठ पढ़ाया और दया के घर को आशीर्वाद देकर पुनः खुशहाली दी।कहानी यह संदेश देती है कि **सच्ची भक्ति, मानवता और दया ही परम बल हैं**, और कन्याओं का सम्मान करना जरूरी है।

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नीयत अच्छी हो तो मजहब दीवार नहीं बनता

वो दिन आज भी स्मृति में ताजे हैं, जब बिहार के छपरा शहर में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे थे. चारों ओर डर का माहौल था, एक अनजानी आशंका हर घर के आंगन में सन्नाटा बनकर पसरी हुई थी. उन्हीं कठिन दिनों में, हमारे घर में एक गरीब मुस्लिम लड़का भी रहता था, जो गांव से पढ़ाई के लिए भेजा गया था.
उसे पापा के किसी पुराने मित्र ने यह कहकर भेजा था कि बेटा पढ़ाई में बहुत तेज़ है, लेकिन हालात ठीक नहीं हैं्. आपने बहुतों की मदद की है, आज इसे भी आपके सहारे की ज़रूरत है.

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