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क्यों वृद्धाश्रम में जाऊँ

अकेली वृद्ध माँ बैठी हुई, आँखों में आँसू और मन में पीड़ा, सामाजिक उपेक्षा का प्रतीक

डॉ. नलिनी शर्मा कृष्णा, प्रसिद्ध लेखिका अहमदाबाद

एक बगिया को सींचा मैंने,
फूल खिला नौवें महीने।

जतन किया, वह कली हुई,
बड़े प्रयास से बड़ी हुई।

सुकुमार कली से फूल बना,
आँधी, बारिश, पवन से बचा।

    बड़ा किया वह मैंने,
    जतन किया वह मैंने।

बड़ा हुआ, सरदार बना,
बगिया का हक़दार बना।

    छोड़ मुझे, बगिया जाना
    ऐसा उसका फ़रमान हुआ।

सींचा मैंने बगिया को,
आँधी, बारिश, तूफ़ानों से।

छोड़ क्यों बगिया मैं जाऊँ?
क्यों वृद्धाश्रम मैं जाऊँ?

भूल गया सारे कर्मों को,
दया, धर्म और सारे धर्मों को।

भूला माँ की ममता को,
कर गया वह निष्ठुरता को।

गीले में सोती थी मैं,
सूखा गद्दा देती थी उसे।

आँखें नम उसकी हो जातीं,
उसे कभी रोने न देती थी।

भूल गया वह कर्मों को,
भूल गया वह धर्मों को।

जिस बगिया को मैंने सजाया,
खिला फूल क्या मैंने पाया?

क्यों वृद्धाश्रम मैं जाऊँ?
बता, “कृष्णा”, क्यों मैं जाऊँ?

क्या ठौर नहीं, ठिकाना मेरा?

One thought on “क्यों वृद्धाश्रम में जाऊँ

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