एक भारतीय वृद्ध दम्पति पार्क की बेंच पर बैठे हैं। उनके सामने बेटा-बहू हाथ जोड़कर क्षमा माँग रहे हैं, जबकि आसपास समाज के लोग और अधिकारी खड़े हैं। वातावरण भावुक, आशावान और पारिवारिक मेल-मिलाप का प्रतीक है।

हर्ष के अंकुर

‘फिर हर्ष के अंकुर फूटने लगे’ एक मार्मिक सामाजिक कहानी है, जो बताती है कि माता-पिता का सम्मान केवल नैतिक कर्तव्य नहीं, बल्कि परिवार की सबसे बड़ी पूँजी है। उपेक्षा, अकेलेपन और पीड़ा से जूझ रहे एक बुजुर्ग दम्पति की कहानी तब नया मोड़ लेती है, जब समाज, प्रशासन और परिवार मिलकर रिश्तों को टूटने से बचाने का प्रयास करते हैं। पश्चाताप, क्षमा और सेवा के भाव से यह कहानी मानवीय संवेदनाओं को गहराई से स्पर्श करती है।

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घर में अकेली बैठी एक बुजुर्ग महिला, खिड़की से आती रोशनी के बीच उदासी और अकेलेपन का भाव

मां की खुशी

‘मां की खुशी’ एक मार्मिक लघु कहानी है, जो माता-पिता के त्याग, उनके अकेलेपन और समाज के डर के बीच उनकी खुशियों के अधिकार को उजागर करती है। यह कहानी रिश्तों की सच्चाई और बदलती सोच को बेहद संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती है।

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अकेली वृद्ध माँ बैठी हुई, आँखों में आँसू और मन में पीड़ा, सामाजिक उपेक्षा का प्रतीक

क्यों वृद्धाश्रम में जाऊँ

यह कविता उस माँ की पीड़ा को स्वर देती है, जिसने जीवन भर अपनी संतान को सींचा, सँवारा और बड़ा किया, लेकिन अंत में उसी से वृद्धाश्रम जाने का आदेश मिला। यह रचना समाज से एक करुण सवाल पूछती है क्या माँ का अब कोई ठौर नहीं?

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यह घर बहुत हसीन है

मेरी ज़िंदगी एक जगह से शुरू नहीं हुई।
वह एक किराए के मकान से दूसरे तक भटकती रही। यह घर सिर्फ़ ईंट और सीमेंट से नहीं बना, इसमें हमारे डर, संघर्ष और सपने बसे हैं। इसीलिए यह साधारण-सा घर मेरे लिए बहुत हसीन है।

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कोई लौटा दे मेरे… वो स्कूल के दिन!

पैदल स्कूल जाना, बिना ट्यूशन के पढ़ाई, सादगी भरा जीवन और माता-पिता की निश्चिंतता। सुविधाओं की कमी के बावजूद उस दौर में संतोष, आत्मनिर्भरता और खुशियों की भरपूर अनुभूति थी, जो आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में दुर्लभ हो गई है।

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जीवन चक्र और अंतिम विदाई

50 वर्षों का साथ, सुख-दुख की साझेदारी और परिवार की खुशियाँ — सब एक क्षण में बदल जाती हैं जब जीवन साथी इस संसार से विदा हो जाता है। यह अनुभव अकेलेपन, स्मृतियों और जीवन के चक्र की गहनता को सामने लाता है। इस लेख में हम एक पति के दृष्टिकोण से उस अंतिम विदाई और जीवन के अनुभवों की झलकियाँ साझा कर रहे हैं, जिन्होंने वर्षों तक परिवार और बच्चों के लिए समर्पण किया।

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छोटी मदद, बड़ा असर

मॉल में आम दिन जैसा लग रहा था, लेकिन 4 साल की आन्या ने दिखा दिया कि छोटी-सी मदद भी बड़ा असर डाल सकती है। अपने बलून और कपकेक्स का पैकेट लिए वह मुस्कुराते हुए उस बच्ची को दे देती है, जिसे कोई नहीं देख रहा था। माता-पिता की नजरों के सामने यह नन्हीं सी मानवता का सबक, उनके दिलों को छू जाता है और समाज में मदद और दयालुता का संदेश फैलाता है।

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मेरी माँ 

मेरी माँ घर से बाहर तो जाती हैं, लेकिन घर को घर पर छोड़ नहीं पातीं। उनकी गृहस्थी उनकी परछाई की तरह हमेशा उनके साथ रहती है। रसोई उनके लिए वह जगह है, जहाँ बच्चे जैसी मासूमियत और स्नेह बसता है। लोग कह सकते हैं कि वह सिर्फ एक गृहिणी हैं, पर मेरी माँ केवल गृहिणी नहीं, मेरी जीवनी हैं।
उन्होंने मुझे इतिहास, भूगोल और गणित की बारीकियाँ, साहस, सहिष्णुता और समग्र दृष्टि दी। लगभग सभी विषयों का ज्ञान और जागरूकता उन्होंने मुझे प्रदान की। इस पूरी प्रक्रिया में मेरे पिता भी मेरे और माँ के विकास में साथ रहे।

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