
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज पुणे
मेरी ज़िंदगी की कहानी किसी एक जगह से शुरू नहीं होती. वह चलती रहती है. एक किराए के मकान से दूसरे तक,एक छत से दूसरी छत के नीचे. आज जब मैं अपने घर की दीवारों को छूता हूँ, तो मुझे एहसास होता है कि यह घर स़िर्फ ईंट, सीमेंट और सरिए से नहीं बना.यह हमारी भटकनों, डर, सपनों और संघर्षों से गढ़ा गया है. सन 2000 में यह घर बना.बाबूजी की नौकरी के अंतिम वर्षों में, उनके रिटायरमेंट से कुछ पहले. लेकिन इस तारीख से पहले हमारी ज़िंदगी में ठहराव नहीं था.हम जैसे खानाबदोश थे.हर कुछ वर्षों में एक नया पता,नई छत, नया डर. कभी कच्ची मिट्टी की छत,कभी कवेलू,तो कभी पतरे की छत वाला मकान. बरसात हमारे लिए स़िर्फ मौसम नहीं थी,वह एक परीक्षा थी. छत से टपकता पानी और घर में जो भी मिलता परात, गिलास, बाल्टी, तपेला सब पंक्तिबद्ध होकर पानी को थामने की कोशिश करते.
रात में जब आसमान में बिजली कड़कती,तो कवेलू की छत से छनकर आती उसकी चमक और गरज हमारे दिलों को हिला देती. मैं डर के मारे कानों में उँगलियाँ डाल लेता और माँ की गोद में या बाबूजी के पास दुबक जाता. उनकी चुप्पी और मौजूदगी मेरे लिए सबसे बड़ी ढाल होती.कभी दो कमरों का किराए का मकान,तो कभी एक कमरे में पूरी गृहस्थी. उसी एक कमरे मेंहमारा सोना, हमारा रोना,हमारे सपने और हमारे डर सब सिमट जाते. बाबूजी का सपना था उनका भी एक घर हो. लेकिन सपने देखना आसान होता है, उन्हें पूरा करना नहीं. आर्थिक हालात हमेशा रास्ता रोककर खड़े रहते. फिर भी बाबूजी ने सपना देखना नहीं छोड़ा. वे अक्सर एक कॉपी में अपने घर का नक्शा बनाते. आगे एक कमरा, फिर एक गलियारा ताकि मेहमान बिना किसी को परेशान किए आ-जा सकें.
शामगढ़ में गट्टू भुआ (डॉ. रमेश कुकड़े) का घर उन्हें बहुत पसंद था. उसी की तर्ज़ पर वे बार-बार रेखांकन करते और ऊपर लिखते “लक्ष्मी निवास” . एक दिन बाबूजी ने सपना पूरा करने का निर्णय ले लिया. वह निर्णय आसान नहीं था. पुस्तैनी मकान बेच दिया गया. उसके साथ कई यादें, कई रिश्ते और कई पीढ़ियों का इतिहास भी बिक गया. लेकिन उसी क़ीमत पर यह घर खड़ा हुआ. मकान बनते समय बाई और बाबूजी दोनों ने दिन-रात मेहनत की. पानी की तरी से लेकर बिखरी रेत समेटने तक, ईंटें जमाने से लेकर हर छोटे काम में उनके हाथ लगे. यह घर उनकी हथेलियों की रेखाओं से धीरे-धीरे आकार लेता गया. इसीलिए इस घर से मेरा रिश्ता स़िर्फ रहने का नहीं है.
इन दीवारों मेंआज भी बाई और बाबूजी की महक बसती है. कई बार मैं दीवारों पर हाथ रख देता हूँ.और उनका स्पर्श महसूस करता हूँ. जैसे वे कह रहे हों हम यहीं हैं. खिड़कियाँ खोलता हूँ. तो बाई की साड़ी में सब्ज़ी के “बघार” की भीनी-भीनी खुशबू आज भी मन को भर देती है. छत की ओर देखता हूँ तो बाबूजी का साया. मेरे साथ चलता हुआ महसूस होता है. कभी-कभी मैं अकेले छत पर चला जाता हूँ. एक-एक चीज़ को ध्यान से देखता हूँ.
वहाँ खड़े होकर मन को अजीब-सा सुकून मिलता है.जैसे ज़िंदगी कुछ देर के लिए थम गई हो. मैंने जाना है कि अगर महसूस करने की क्षमता हो, तो ईंट, सीमेंट और सरिए में भी अपनापन होता है. उनसे बात की जा सकती है,उनसे लिपटकर रोया जा सकता है. वे भी सुनते हैं बस शोर नहीं मचाते. यहाँ जो सुकून है, वह महानगरों की हाई-सोसायटी में भी नहीं जहाँ खिड़कियों से हिल-व्यू और गार्डन-व्यू दिखते हैं, लेकिन दिल अक्सर खाली रहता है. न यहाँ बादलों की छाँव है,न फूलों जैसे रास्तेफिर भीयह घर बहुत हसीन है. यह ईंट-पत्थरों का घर नहीं,यह हमारी हसरतों,हमारे संघर्ष और हमारे माता-पिता के सपनों का घर है. यह घर ज़मीन के बहुत करीब है और शायद इसी वजह से मेरे दिल के भी सबसे करीब है. कभी आइए इस ग़रीबख़ाने में. साथ बैठकर एक कप चाय पिएँगे.
क्योंकि यह घर बहुत हसीन है.

घर सिर्फ घर नहीं होता। वो यादों का, अपनों का और सपनों का हिस्सा होता है।
बहुत सही… अभी तक हम कहते आए हैं दीवारों के भी कान होते हैं किंतु दीवारे सिर्फ सुनती ही नहीं, बात भी करती है…बस आपकी महसूस करने की क्षमता होनी चाहिए। कितनी सुंदर बात…. बाई की साड़ी में बघार की भीनी-भीनी खुशबू। दुआओं के रूप में एक साया हर वक्त साथ चलता है एक साया ऊर्जा बनकर…..