कहाँ गए वो दिन
पैसा कम था, पर अपनापन भरपूर था। गली-मुहल्ले रिश्तों से भरे थे, और मुस्कानें दिखावे से नहीं, दिल से उपजती थीं।

पैसा कम था, पर अपनापन भरपूर था। गली-मुहल्ले रिश्तों से भरे थे, और मुस्कानें दिखावे से नहीं, दिल से उपजती थीं।
माँ जो बिना कहे हर दुख समेट लेती है और हर सुख में चुपचाप पास खड़ी रहती है। माँ की उपस्थिति यहाँ दूरी से परे, स्मृति और आत्मा में रची-बसी हुई है—ऐसी शक्ति जो कभी जुदा नहीं होती।
सन 1990 का दशक, जब घरों में टीवी और वीसीआर थे, और मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन कैसेटें थीं। फ़िल्में घर पर किराए पर लेकर देखी जातीं ऋषि कपूर और शाहरुख़ की दीवाना या संजय दत्त और माधुरी की साजन और फिर कैसेट लौटाई जाती। देबु की छोटी दुकान, पाकिस्तानी स्टेज प्ले की हास्य कैसेटें, ऑडियो कैसेट की अपनी आवाज़ और गली में बच्चों का टीवी देखने का मज़ाये सब उस समय की यादों का हिस्सा थे। धीरे-धीरे केबल टीवी और डिजिटल तकनीक ने कैसेट का दौर समाप्त कर दिया, लेकिन उस समय का अपनापन और इंतज़ार आज भी यादों में जीवित है।
मेरी ज़िंदगी एक जगह से शुरू नहीं हुई।
वह एक किराए के मकान से दूसरे तक भटकती रही। यह घर सिर्फ़ ईंट और सीमेंट से नहीं बना, इसमें हमारे डर, संघर्ष और सपने बसे हैं। इसीलिए यह साधारण-सा घर मेरे लिए बहुत हसीन है।
महिदपुर रोड एक ऐसी जगह है जहाँ सेवा और अपनापन हर घर में बसा है। रात के अंधेरे में भी किसी की तबीयत बिगड़े तो सौभाग दादा का ट्रक हमेशा एंबुलेंस की तरह तैयार रहता था। यहाँ हर मुस्कान, हर रिश्ते में परंपरा और निस्वार्थ सेवा की गंध महसूस होती है।
“छोड़ आये अपना वो गाँव” में कवि अपने बचपन और गाँव की यादों को भावपूर्ण ढंग से व्यक्त करते हैं। यह कविता गाँव की सरल, प्राकृतिक और आत्मीय जीवन शैली के सुंदर चित्रण से भरी है—बैलगाड़ियाँ, खेतों की हरियाली, पनिहारन की पायल की झनकार, बुजुर्गों की चौपाल और सुबह की ग्रामीण रौनक। शहर की चमक-धमक, गगनचुंबी इमारतें और व्यस्त जीवन के बीच कवि को गाँव की मिट्टी, पेड़ों की छांव और अपनापन याद आता है। कविता यह दर्शाती है कि चाहे जीवन कितनी भी व्यस्त या आधुनिक क्यों न हो, अपने गाँव और सरल जीवन की याद हमेशा हृदय में बनी रहती है, और व्यक्ति को फिर से लौटने की लालसा जगाती है।
“मैं तो आज भी वैसी ही हूँ, वही यादों और स्नेह में जीती हुई। बदल गए तो सिर्फ तुम—वो नज़रें, वो बातें, वो अपनापन सब पीछे छूट गया। अगर अब मैं बदल भी गई हूँ, तो सवाल मुझसे नहीं, खुद से करना।”