छोड़ आये अपना वो गांँव…

मंजू शर्मा, मनस्विनी, प्रसिद्ध लेखिका भुवनेश्वर

छोड़ आये अपना वो गांँव
शहर अजनबियों के, आ बसे
छोड़ आए अपना वो गाँव
चलती थी जहाँ बैलगाडियाँ
चलते थे कोसों अपने पाँव ।
छोड़ आए अपना वो गाँव ।।

याद आती गाँव की चौपाल वो
जहाँ बैठ बुजुर्ग अनुभव सुनाते
तर्को से बड़े-बड़े विवाद
चुटकियों में वह सुलझाते।
सज-धज कर पनिहारन जब चलती।
छम-छम पायल बजे उसके पाँव।
छोड़ आए अपना वो गाँव ।।

रौनक तब कुएँ की बढती,
जब हँसी- ठिठोली वो करती।
सरसों- गेहूँ की फलियाँ जब पकती
हरी चुनरी और घाघरा पीला
ओढती, मस्ताती धरती।
फसलें लहलहाती लगती प्यारी।
लगती मिट्टी की सौधी महक न्यारी
अपने गाँव की मिट्टी पावन
उसकी हरियाली थी मनभावन।
सुबह मुर्गे की कुकड़ू कू-कू
छत की मुंडेर पर कौवे की काँव।।
छोड आए अपना वो गाँव ।

शहर की गगनचुंबी इमारतें…
शराब में नहायी सब राते
चमचमाती है सड़कें, गली सब
पर कहीं है नहीं पेड़ो की छांव
याद आता अब हमको गाँव।।

हर शख्स रहा भाग यहाँ है
अपनी मस्ती में मस्त यहाँ है।
नहीं दिखता जरा भी अपनापन
अपने स्वार्थ मे सब है मगन।
कोई करता न यहाँ राम -राम।
मन करता है फिर से जाकर
बस जाऊँ अपने उस गाँव ।

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