प्रदूषित शहर में झोपड़ी के पास खड़ी महिला धुएँ से भरे आसमान को देखते हुए

ज़हरीली हवाएँ

रीमा धुएँ और धूल से भरे आसमान को निहारते हुए सोचती है—क्या स्वच्छ हवा केवल ऊँची इमारतों में रहने वालों का अधिकार है? झोपड़ियों में रहने वाले लोग भी तो उसी धरती और हवा का हिस्सा हैं। एक नन्हा पौधा उसे उम्मीद देता है कि अगर हम चाहें, तो ज़हरीली हवाओं के बीच भी जीवन को बचाया जा सकता है।

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नया दिन, नई आशा

सूरज की कोमल किरणों के साथ नया दिन, नई आशा और उमंग लेकर आता है। प्रकृति की हरियाली, कल-कल करती नदियाँ और चहकती चिड़ियाँ जीवन में प्रेरणा और ऊर्जा भरती हैं। साहस और मेहनत के साथ हर चुनौती को पार करना ही सफलता का मार्ग है।”

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रंगों से सजा जीवन

लाल बिंदी की ममता हो या आसमां का नीला सुकून — हर रंग जीवन को एक नई दिशा देता है। हर रंग अपनी कहानी कहता है, और इन्हीं रंगों से जीवन सच में पूर्ण बनता है।”

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जब बदरा रोया…

यह कविता प्रकृति के विनाश पर चिंता और संरक्षण का संदेश देती है। कवि दिखाता है कि जब पर्यावरण आहत होता है, तो धरती की सुंदरता और जीवन का संतुलन दोनों बिगड़ जाते हैं। वह मानव से आग्रह करता है कि जंगल बचाए, प्रदूषण रोके और संसाधनों का संयमित उपयोग करे। अंत में कवि आशा जताता है कि यदि हम प्रकृति से प्रेम करें और उसकी रक्षा करें, तो धरती फिर से हरियाली, सुगंध और आनंद से भर जाएगी।

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मैं जब पेड़ लगाता हूँ

प्रकृति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण की सुंदर अभिव्यक्ति है। इसमें कवि ने पेड़ लगाने के आनंद और उससे जुड़ी संवेदनाओं को सहज बालसुलभ भाव में प्रस्तुत किया है। कविता यह संदेश देती है कि पेड़ केवल फल या छाया ही नहीं देते, बल्कि वे मनुष्य और जीव-जंतुओं — सबके जीवन का आधार हैं। दादी के स्नेहिल शब्दों से लेकर झूले पर झूलने की कल्पना तक, हर पंक्ति में प्रकृति के साथ आत्मीय संबंध झलकता है। यह रचना बच्चों में पेड़ों के प्रति प्रेम, जिम्मेदारी और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता जगाने वाली है।

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नव अंकुर की आस

नवपल्लवित पौधा अपनी कोमल जड़ों से धरती का आशीर्वाद लेकर जीवन की नई शुरुआत करता है। वह नव अंबर और नव भोर के साक्षी के रूप में जन्म लेता है, अपने भीतर जीवन की नयी आस संजोए हुए। चारों ओर फैले उपवन की मधुर सुवास उसे उल्लास से भर देती है। वह अभी शिशु है, पर हर दिन वायु और जल का स्पर्श पाकर बढ़ने की आकांक्षा रखता है।

वह जानता है कि एक दिन वह विशाल वृक्ष बनेगा—जिसकी छाया में संसार विश्राम करेगा, जो अनगिनत जीवों को ऑक्सीजन और जीवनदान देगा। उसका अस्तित्व निःस्वार्थ है, उसका हर अंश किसी न किसी के काम आने वाला है

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छोड़ आये अपना वो गांँव…

“छोड़ आये अपना वो गाँव” में कवि अपने बचपन और गाँव की यादों को भावपूर्ण ढंग से व्यक्त करते हैं। यह कविता गाँव की सरल, प्राकृतिक और आत्मीय जीवन शैली के सुंदर चित्रण से भरी है—बैलगाड़ियाँ, खेतों की हरियाली, पनिहारन की पायल की झनकार, बुजुर्गों की चौपाल और सुबह की ग्रामीण रौनक। शहर की चमक-धमक, गगनचुंबी इमारतें और व्यस्त जीवन के बीच कवि को गाँव की मिट्टी, पेड़ों की छांव और अपनापन याद आता है। कविता यह दर्शाती है कि चाहे जीवन कितनी भी व्यस्त या आधुनिक क्यों न हो, अपने गाँव और सरल जीवन की याद हमेशा हृदय में बनी रहती है, और व्यक्ति को फिर से लौटने की लालसा जगाती है।

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सितंबर अहा!

सितंबर आते ही ऋतु-संधि का मधुर प्रकाश धरती पर उतर आता है। बरखा की विदाई और शरद की मुस्कान एक साथ झलकने लगती है। खेतों में धान और मक्का लहलहाते हैं, तो आँगनों में गेंदा और कमल अपनी सुगंध बिखेरते हैं। यह महीना केवल प्रकृति के बदलते रंगों का ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सवों का भी साक्षी है। पितृपक्ष की श्रद्धा और गणपति का उल्लास, दोनों एक साथ वातावरण को भक्ति और आनंद से भर देते हैं। नीलम-से गगन में पुखराज-सा सूरज चमकता है और मन के आँगन में एक नया उजास जगाता है। सचमुच, सितंबर नवजीवन का संदेश लेकर आता है।

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हरीतिमा

हरीतिमा कविता में कवयित्री ने प्रकृति की सौंदर्यता और उसकी अद्भुत पुनरुत्थान शक्ति को दर्शाया है। अंधड़ में धराशायी हुए वृक्षों के अवशेषों पर फिर से नवपल्लव खिलते हैं, जीवन की जिजीविषा से भरा एक बैंजनी फूलों का कतार उग आता है। कविता यह संदेश देती है कि धरती बिना किसी लेन-देन के अपार स्नेह और जीवन देती है। हरीतिमा का यह निस्वार्थ उपहार कवयित्री के अंतर्मन में कवि के उस अमर वाक्य को बार-बार गूंजने पर विवश करता है – “आ: धरती कितना देती है!”

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