जब बदरा रोया…

शोभा सोनी, बड़वानी (मध्य-प्रदेश)

प्रकृति पर जुल्म देख
रात भर रोया बदरा
भोर भी धुंधरी रही
हर तरफ छाया कोहरा।

पंछी चहके न फूल खिले
थमी हवाओ में उमस घुले
अस्त व्यस्त हुआ धरा का तन
हुई भोर नई पुनः जागा जीवन।

संभलो अब भी बचालो जंगल
त्यागो अहम रोको ये दंगल
परिणाम वरना तुम जान लो
मौत निश्चित करीब है मान लो।

प्रदूषित हवाएँ दम घोट रही हैं
ऐ .सी. इसमे जहर घोल रही हैं
माना संसाधन अच्छे हैं सभी
इस्तेमाल में इनके जरा करो कमी।

आगे बढ़ो लगाओ पेड़ नए
जीवन हित करो प्रयास नए
सुद्ध होगा जो परियावर्ण ये
स्वर्ग सा होगा वातावर्ण ये।

हर भोर फिर गीत सुनायेगी
मन भावन राग बनायेगी।
पंछियों की मीठी कलरव
जब आँगन में तुम्हारे आएगी।

शुभ सुबह की राम राम से
आंनद चमन -खिल जाएगा
और सुगंधित प्राण पवन से
जीवन खुशियों से भर जाएगा।

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