धरती माँ के प्रतीकात्मक स्वरूप के साथ वृक्षों की कटाई, सूखती नदियों और पिघलते ग्लेशियरों को दर्शाता पर्यावरण संरक्षण का यथार्थवादी दृश्य।

प्रकृति की चेतावनी

“प्रकृति की चेतावनी” धरती माँ की ओर से मानवता को दिया गया एक मार्मिक संदेश है। कविता में वृक्षों की कटाई, नदियों की दुर्दशा, पिघलते ग्लेशियर और पर्यावरण संकट की गंभीरता को उजागर किया गया है। यह रचना मनुष्य को चेताती है कि यदि समय रहते प्रकृति का संरक्षण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे।

Read More
81 वर्षीय पिता फोन पर बात करते हुए, सामने चिंतित बेटा-बहू और लैपटॉप-मोबाइल के साथ साइबर ठगी का दृश्य, घर में पुलिस पहुंचती हुई

81 साल के पिता बने हीरो, बेटे को ठगी से बचाया

: जहां साइबर ठग अक्सर बुजुर्गों को निशाना बनाकर उन्हें डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाते हैं, वहीं निगडी में एक 81 वर्षीय पिता ने अपनी सूझबूझ से ठगों की पूरी साजिश नाकाम कर दी. उनकी सतर्कता से उनके बेटे और बहू को लाखों रुपये की ठगी से बचाया जा सका.

Read More
प्रदूषित शहर में झोपड़ी के पास खड़ी महिला धुएँ से भरे आसमान को देखते हुए

ज़हरीली हवाएँ

रीमा धुएँ और धूल से भरे आसमान को निहारते हुए सोचती है—क्या स्वच्छ हवा केवल ऊँची इमारतों में रहने वालों का अधिकार है? झोपड़ियों में रहने वाले लोग भी तो उसी धरती और हवा का हिस्सा हैं। एक नन्हा पौधा उसे उम्मीद देता है कि अगर हम चाहें, तो ज़हरीली हवाओं के बीच भी जीवन को बचाया जा सकता है।

Read More

जब बदरा रोया…

यह कविता प्रकृति के विनाश पर चिंता और संरक्षण का संदेश देती है। कवि दिखाता है कि जब पर्यावरण आहत होता है, तो धरती की सुंदरता और जीवन का संतुलन दोनों बिगड़ जाते हैं। वह मानव से आग्रह करता है कि जंगल बचाए, प्रदूषण रोके और संसाधनों का संयमित उपयोग करे। अंत में कवि आशा जताता है कि यदि हम प्रकृति से प्रेम करें और उसकी रक्षा करें, तो धरती फिर से हरियाली, सुगंध और आनंद से भर जाएगी।

Read More

किसको ढोओगे

कविता सत्ता, समाज और मानवता पर गहरा प्रश्न उठाती है। कवि पूछता है. आखिर तुम किसे अपने कंधों पर उठाओगे, किसे बचाओगे? जब नैया मझधार में डूबेगी, तब कौन किसे पार लगाएगा? सत्ता की लालसा में जो सबको मिटा देने की सोच है, वही अंततः विनाश का कारण बनेगी। भारत की धरती हर धर्म, हर जाति का आंचल है. यहाँ कीचड़ में भी कमल खिलता है। लेकिन जब राजनीति भाजन का रूप लेती है, तब वही ताक़त अपने ही हाथों से हार जाती है। गरीब, सच्चे, उज्जवल मन वाले लोग पूछते हैं. क्या हर चुनाव में बस हम पर ही डोरे डालोगे, क्या सबको साथ में मारोगे?

Read More