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प्रकृति की चेतावनी

धरती माँ के प्रतीकात्मक स्वरूप के साथ वृक्षों की कटाई, सूखती नदियों और पिघलते ग्लेशियरों को दर्शाता पर्यावरण संरक्षण का यथार्थवादी दृश्य।

प्रीति अरोरा, बदायूं (उत्तरप्रदेश)

मैं धरती माँ, तुम मेरे नादान बालक,
करती आ रही हूँ सदियों से माफ़।
जब किसी चीज़ की अधिकता बढ़ जाती है,
तब प्रकृति प्रलय का हाहाकार मचाती है।।

वृक्ष काटे मेरे, नदियाँ दिल से रोईं,
नन्ही चिड़िया एक पल चैन से न सोई।
पिघल रहे हैं ग्लेशियर, बढ़ रहा संकट है,
तभी तो मानव, तेरा विनाश प्रचंड है।।

जैसे तू अपनों से बिछड़कर रोता है,
मेरे वृक्षों के कटान से मेरा दिल भी रोता है।
पक्षियों का तू उजाड़ रहा है घरौंदा,
क्या तू बचेगा फिर? नहीं, अब और समझौता।।

अभी भी वक्त की चेतावनी है, मानव संभल जा,
बचा ले झील, नदियाँ, पर्वत और ताल-तलैया।
वरना एक दिन घुट-घुटकर जीवन-यापन होगा,
आने वाली पीढ़ियों का भी जीवन दूभर होगा।।


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