
सुरेश परिहार, पुणे
राघव और रिद्धिमा की पहचान अब उस मोड़ पर आ चुकी थी, जहाँ रिश्तों को नाम देना ज़रूरी नहीं रह जाता। दोस्ती अब भी थी, मगर उसके भीतर कुछ और भी था एक अपनापन, एक आदत, एक ऐसी उपस्थिति, जिसकी कमी तुरंत महसूस होने लगे।
राघव अब रिद्धिमा के मन के मौसम पढ़ने लगा था। उसकी आवाज़ सुनकर समझ जाता कि दिन कैसा बीता होगा। और रिद्धिमा… वह तो जैसे राघव से बात किए बिना रह ही नहीं पाती थी। इधर राघव का भी वही हाल था। दोनों की बातचीत अब दिनचर्या नहीं, ज़रूरत बन चुकी थी।
यदि किसी वजह से एक दिन भी बात न हो पाती, तो दोनों अपने-अपने कामों में लगे रहते, मगर भीतर कहीं एक अधूरापन साथ चलता रहता। जैसे दिन पूरा हो गया हो, पर कोई ज़रूरी बात अभी भी बाकी रह गई हो।
रिद्धिमा के भीतर भी धीरे-धीरे प्रेम को लेकर एक नई समझ जन्म लेने लगी थी। उसे महसूस होने लगा था कि प्रेम केवल आकर्षण नहीं होता, न ही बड़े-बड़े वादों और मीठे शब्दों का खेल है। प्रेम शायद वह जगह है, जहाँ मन अपने सबसे असुरक्षित रूप में भी सुरक्षित महसूस करे। एक स्त्री के लिए प्रेम अक्सर केवल संबंध नहीं होता; वह भरोसे और सुकून का दूसरा नाम बन जाता है।
रिद्धिमा ने भी यही महसूस करना शुरू कर दिया था।
दुनिया से लड़ते-लड़ते, हर मोर्चे पर खुद को मज़बूत साबित करते-करते वह थक जाती थी। मगर राघव के पास आकर उसके भीतर की लड़ाई शांत होने लगती। लोग कहते हैं कि प्रेम में स्त्रियाँ बहुत बोलती हैं, बहुत शिकायत करती हैं। लेकिन सच तो यह है कि जब प्रेम गहरा हो जाए, तो कई बार शब्द कम पड़ जाते हैं।
रिद्धिमा भी अब वैसी ही हो चली थी। उसने राघव के सामने अपने मन के दरवाज़े बंद रखना छोड़ दिया था। अपने डर, अपने राज़, अपनी कमज़ोरियाँ सब धीरे-धीरे उसके सामने रख देने लगी थी। उसे हर बात समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। कई बार राघव की चुप मौजूदगी ही उसके लिए जवाब बन जाती।
उसे यक़ीन था-यह आदमी उसके शब्दों से ज़्यादा उसकी खामोशियों को सुनता है।
यही भरोसा प्रेम की सबसे मज़बूत नींव होता है।
रिद्धिमा दिनभर की हर छोटी-बड़ी बात सबसे पहले उसी से कहना चाहती थी। उसे भरोसा था कि उसके ज़ख्मों पर मरहम रखा जाएगा, नमक नहीं। उसके आँसू बोझ नहीं बनेंगे। शायद इसी वजह से दिनभर की थकान के बाद राघव का एक साधारण-सा सवाल-“कैसी हो?” उसके चेहरे पर मुस्कान ले आता था।
प्रेम हमेशा बड़े इज़हारों में नहीं होता। कभी-कभी वह ऐसी छोटी चिंताओं में छिपा होता है।
रिद्धिमा का गुस्सा, उसकी शिकायतें, उसका रूठ जाना ये सब भी प्रेम की भाषा थे। वह राघव से नहीं, कई बार उसकी आदतों से लड़ती थी। उसकी लापरवाही से, उसके स्वास्थ्य को लेकर, उसके भविष्य को लेकर। क्योंकि जहाँ अपनापन होता है, वहाँ खो देने का डर भी साथ जन्म लेता है।
और राघव… वह भी अब बदलने लगा था।
उसे महसूस होने लगा था कि रिद्धिमा उसके जीवन में केवल एक व्यक्ति नहीं रही। उसने उसके सपनों में जगह बना ली थी। सुबह की काली चाय अब अकेली नहीं लगती थी। अधूरी बातचीतें भी मीठी लगने लगी थीं। आने वाले दिनों की कल्पनाओं में अनजाने ही रिद्धिमा शामिल हो गई थी।
दुनिया के सामने मज़बूत और सधे हुए दिखने वाला राघव, रिद्धिमा के सामने बिल्कुल बच्चा हो जाता था। रिद्धिमा कई बार मुस्कुराकर उससे कहती-“मुझे प्यार से ज़्यादा ममत्व उमड़ा है तुम पर, राघव।”
और हर बार राघव बस उसे सुनता रहता।क्योंकि कुछ भाव ऐसे होते हैं, जिनका उत्तर शब्दों से नहीं, केवल महसूस करके दिया जाता है। रिद्धिमा के भीतर भी एक छोटी-सी बच्ची थी, जो प्रेम में एक ऐसा कोना चाहती थी, जहाँ उसे हर समय मज़बूत साबित न करना पड़े। जहाँ वह टूट सके, रो सके, और फिर उसी अपनापन में सिमटकर खुद को समेट सके। उसके लिए प्रेम कमजोरी नहीं था; वह एक सुरक्षित जगह थी, जहाँ उसका असली व्यक्तित्व साँस लेता था। राघव भी शायद जीवन में यही खोज रहा था अपनापन, समझ और सुरक्षा।
वह समझ चुका था कि प्रेम तब सबसे सुंदर होता है, जब वह अधिकार नहीं, सहारा बने। जब उसमें डर नहीं, विश्वास हो। और जब दो लोग एक-दूसरे को बदलने नहीं, बल्कि समझने की कोशिश करें। शायद इसी वजह से वे दोनों एक-दूसरे के सामने अपने सबसे सच्चे रूप में रह पाते थे। क्योंकि यदि कोई व्यक्ति आपके सामने अपने मन का बचपना, अपनी नासमझियाँ और अपनी सच्ची भावनाएँ बिना डर के जी सके, तो वह केवल प्रेम नहीं, गहरा विश्वास होता है। और शायद विश्वास से बड़ा प्रेम कोई नहीं होता।
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कहानी का ये मोड़ रोचक लगा 👌
लाजवाब
बहुत बढ़िया 👌
अनकहा प्रेम…अहा!!एक सात्विक अनुभव जहां शरीर गौण और मन,आत्मा प्रधान हो जाता है प्रेम के सुनहरे अहसासों से भरी खूबसूरत कहानी…