
पूनमसिंह वत्सला, जमशेदपुर
साथ हमारा ऐसा हो तुम,
मेरे हाथों की लकीर हो।
लो प्रिय, भर दो माँग मेरी,
इस सिंदूर की ऐसी तासीर हो।
साथ हमारा जन्मों का हो,
जैसे चाँद और चाँदनी रहें।
तेरा-मेरा अब क्या कहना,
हर साँस में विश्वास रहे।
साथ चलें हम धरा से नभ तक,
ग़म की हर रेखा मिटा दें।
जो भी आए जीवन-पथ में,
हँसकर उसको अपना लें।
लो, मैं हो गई प्रिय तुम्हारी,
जब तक धड़कन में साँस रहे।
अब मुस्कुरा दो, प्रियवर मेरे,
बस तुम पर ही विश्वास रहे।
हौसला कम न हो हमारा,
हाथों में यूँ ही हाथ रहे।
साथ-साथ ही रहना, साजन,
और माँग सदा सिंदूर से सजी रहे।
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