
मधु मिश्रा
“सुनो ना… मम्मी का फ़ोन आया था। चाचा जी को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। हालत कुछ ठीक नहीं है। बेटा, एक बार तुम लोग उन्हें देखने आ जाते तो अच्छा होता…”
“तो तुमने क्या कहा?”
“मैंने कहा, ‘देखती हूँ मम्मी। इन्हें ऑफिस से छुट्टी लेनी होगी। जितनी जल्दी हो सकेगा, हम लोग आ जाएँगे।'”
“लेकिन सुधा, मेरी छुट्टियाँ तो ख़त्म हो चुकी हैं। अब जितने दिन की भी छुट्टी लूँगा, उतनी तनख़्वाह कटेगी। ऐसा करो, तुम अकेली चली जाओ। दो-चार दिन मैं मैनेज कर लूँगा। हम दोनों गए तो खर्च भी ज़्यादा होगा। आने-जाने का किराया, टैक्सी का भाड़ा, और वहाँ कुछ फल-वगैरह भी तो ले जाने होंगे…”
“नहीं, आप भी चलिए। हम चाचा जी को देखकर तुरंत वापस आ जाएँगे। एक दिन की ही तो तनख़्वाह कटेगी। कम पैसों में मैं घर का खर्च किसी तरह चला लूँगी, पर ऐसे समय में आप नहीं गए तो पापा-मम्मी को अच्छा नहीं लगेगा।”
सुधा ने पति विनोद को वक़्त की नज़ाकत समझाने की कोशिश की।
अगले दिन विनोद की दो दिन की छुट्टी मंज़ूर हो गई और दोनों चाचा जी को देखकर वापस लौट आए।
मगर आठ दिन बाद ही फ़ोन आया—चाचा जी नहीं रहे।
ख़बर सुनते ही विनोद सिर पकड़कर बैठ गया। सुधा ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा-“रिश्तेदारी निभानी हो तो रुपये-पैसे कितना मायने रखते हैं, न? कौन किस वजह से दुःख की घड़ी में नहीं पहुँच पाया, लोग यह नहीं सोचते। लेकिन कौन आया और कौन नहीं, इसका हिसाब ज़रूर रखा जाता है।”
थोड़ी देर रुककर वह फिर बोली-
“मातमपुर्सी में जाना तो पड़ेगा ही, लेकिन इस बार मैं अकेले ही चली जाऊँगी…”
विनोद ने चौंककर उसकी ओर देखा।
सुधा की आँखों में एक गहरी समझ थी।
वह समझ चुका था कि रिश्तों की किताब में मजबूरियाँ नहीं, मौजूदगी दर्ज की जाती है।

सम्वेदनशील
आदरणीया आपने मेरी रचना को सराहा आपको हृदय से आभार 🙏❣️💐
दिल को छू गई
तहे दिल से आभार मौसमी 💝❣️
सुरेश जी रचना प्रकाशन के लिए आपको हृदय से आभार 🙏
परिस्थितियों का सुंदर वर्णन।
परिस्थितियों, संबंधों और आर्थिक संघर्षों को बखूबी बयां करती रचना