आकाश गंगा

बादलों और सितारों के बीच शांत भाव से आकाश की ओर निहारती एक स्त्री

रीता मिश्रा तिवारी

आकाशगंगा में तैरते बादलों के बीच मैं
पूछती हूँ—
गर यहीं रह जाऊँ तो..?

स्याह सागर में अठखेलियाँ करती मैं,
सफेद बादलों की होकर रह जाऊँ तो..?

एक प्रश्न है…

कितना अच्छा हो, जो
एक आशियाना हो आकाश में,
और सैर करूँ बादलों के रथ पर।
जो कभी धरती से जा मिलूँ, तो पूछूँ
कहो, क्या हाल है?
मैं याद हूँ या नहीं..?

जानते हो,
वहाँ रात हौले-हौले उतरती है।
चाँद और बादलों की शरारत में
सितारे टिमटिम करते हैं।
सूरज की गर्मी भी नरम है,
बूँदों की ध्वनि मीठी है।
दिशाएँ और ऋतुएँ बदलती नहीं हैं,
समय ठहर जाता है।
चाहती हूँ, वक्त के साथ मैं भी ठहर जाऊँ।
कहो न, इरादा सही है मेरा
या गलत हूँ मैं..?

सुनो न,
अब बादल मेरे जीवन में तैरते हैं,
बारिश या तूफान लाने के लिए नहीं,
मेरे जीवन के सूर्यास्त में रंग भरने के लिए।
न भीड़, न शोर, न ही कोई प्रतियोगिता।
महत्त्वाकांक्षाओं की लालसा रही नहीं,
अब सिर्फ शांति और सुकून है..!

इन रचनाओं को भी पढ़िए और अपनी राय जरुर व्यक्त करें

तेरे मेरे दरमियां…
रंगरेजन
स्मृति और… तुम !
गोदना
करवटें बदलते रहे, सारी रात हम…
दीद उसकी

One thought on “आकाश गंगा

  1. तहेदिल से बहुत बहुत धन्यवाद आपको सुरेश जी 🙏

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *