अनगढ़

बिना मेकअप और बिखरे बालों के साथ मुस्कुराती एक युवती, जो सच्चे प्रेम और स्वाभाविक सुंदरता का प्रतीक है।

मौसमी चंद्रा, पटना

वह हर तस्वीर पर दिल बनाता था।

एक दिन मैंने बिना कंघी किए बालों, सूजी हुई आँखों और बेतरतीब चेहरे के साथ वीडियो कॉल उठा लिया।

“सॉरी, आज बहुत खराब लग रही हूँ!” मैंने हँसकर कहा।

वह कुछ देर मुझे देखता रहा, फिर बोला-“आज पहली बार मुझे तुम मिली हो।”

“और बाकी दिनों?”

“बाकी दिनों तुम्हारी तस्वीरें मिलती हैं हल्की-सी बनावटी। और पता है, अनगढ़ रूप की अलग सुंदरता होती है, फिर चाहे वह कोई वस्तु हो या इंसान।”

उसकी बात सुनकर मैं चुप रह गई। पहली बार लगा, प्रेम शायद वही होता है, जहाँ सुंदर दिखने की कोशिश नहीं करनी पड़ती।

उसे हमेशा याद रहता है कि मुझे कैसी चाय पसंद है, लेकिन यह याद नहीं रहता कि मैंने पिछली बार कौन-से रंग के कपड़े पहने थे या कौन-सी शेड की लिपस्टिक लगाई थी।

और प्रेम शायद आखिर में बस इतना ही होता है- कोई एक इंसान, जो तुम्हारे सबसे साधारण रूप में भी, खुले बालों और बिखरे चेहरे के साथ तुम्हें देखकर कहे- “अच्छी तो लग रही हो… क्या ज़रूरत है सजने की?


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8 thoughts on “अनगढ़

    1. और यही प्रेम याद रहता है उम्रभर… सुंदर रचना

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