
रेनु शब्द मुखर,जयपुर
आज विश्व पर्यावरण दिवस है। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी पर्यावरण संरक्षण के संकल्प लिए जाएँगे, पौधारोपण होगा, जागरूकता रैलियाँ निकलेंगी और सोशल मीडिया पर प्रकृति के प्रति प्रेम व्यक्त करने वाले संदेशों की भरमार होगी। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल एक दिन की चिंता से उस पर्यावरण को बचाया जा सकता है, जो प्रतिदिन हमारे ही हाथों घायल हो रहा है?
मनुष्य ने विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति को मात्र संसाधन समझ लिया है, जबकि वास्तव में वही हमारे अस्तित्व का आधार है। जंगलों को काटकर कंक्रीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं। नदियाँ, जो कभी सभ्यताओं की जननी थीं, आज प्रदूषण से कराह रही हैं। हवा, जो जीवन का आधार है, अनेक शहरों में बीमारी का कारण बन चुकी है। बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, बाढ़, सूखा और प्राकृतिक आपदाएँ केवल समाचारों की सुर्खियाँ नहीं हैं, बल्कि प्रकृति द्वारा दिए जा रहे वे संकेत हैं जिन्हें हम लगातार अनदेखा कर रहे हैं।
विडंबना यह है कि जिस पर्यावरण ने हमें जीवन दिया, उसी के प्रति हमारा व्यवहार सबसे अधिक उपेक्षापूर्ण हो गया है। हम अपने घर को स्वच्छ रखने के लिए चिंतित रहते हैं, लेकिन धरती, जो हम सबका साझा घर है, उसकी स्वच्छता और सुरक्षा को लेकर उतने गंभीर नहीं हैं। प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग, जल का अपव्यय, वृक्षों की अंधाधुंध कटाई और प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन हमारी संवेदनहीनता का प्रमाण हैं।
पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। यह प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व है। यदि हम वास्तव में बदलाव चाहते हैं, तो इसकी शुरुआत अपने दैनिक जीवन से करनी होगी। पानी की एक-एक बूँद बचाना, प्लास्टिक का उपयोग कम करना, अधिक से अधिक पेड़ लगाना और उनकी देखभाल करना, ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग करना तथा प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव विकसित करना छोटे-छोटे कदम अवश्य हैं, लेकिन इनका प्रभाव अत्यंत व्यापक हो सकता है।
आज की सबसे बड़ी आवश्यकता केवल पौधारोपण नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति संवेदनशील सोच का विकास है। हमें यह समझना होगा कि पृथ्वी हमारे पूर्वजों से मिली विरासत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों से लिया गया उधार है। यदि हम इसे सुरक्षित नहीं रखेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी।
विश्व पर्यावरण दिवस हमें केवल एक अवसर ही नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी देता है। यह समय है कि हम विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करें। क्योंकि प्रकृति कभी बदला नहीं लेती, वह केवल हिसाब बराबर करती है। यदि हमने आज भी उसके संकेतों को नहीं समझा, तो आने वाला समय और अधिक कठिन हो सकता है।
आइए, इस पर्यावरण दिवस पर केवल भाषणों और संकल्पों तक सीमित न रहें। एक ऐसे समाज के निर्माण का प्रयास करें जहाँ विकास और प्रकृति साथ-साथ चलें। क्योंकि जब धरती सुरक्षित होगी, तभी मानवता का भविष्य भी सुरक्षित होगा।
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