विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पेड़ लगाते लोग, हरित प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता यथार्थवादी दृश्य।

प्रकृति बदला नहीं लेती, केवल हिसाब बराबर करती है

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्रस्तुत यह लेख प्रकृति और मानव के संबंधों पर गंभीर चिंतन करता है। इसमें बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वृक्षों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के दुष्परिणामों को रेखांकित करते हुए पर्यावरण संरक्षण को प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व बताया गया है। लेख यह संदेश देता है कि प्रकृति बदला नहीं लेती, बल्कि समय आने पर अपने साथ किए गए व्यवहार का हिसाब बराबर करती है।

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आदिवासी गोदना से प्रेरित धरती पर उकेरी हरियाली, जंगल, नदियाँ और वृक्षों का प्रतीकात्मक कलात्मक दृश्य।

गोदना

‘गोदना’ कविता आदिवासी परंपरा और प्रकृति के गहरे संबंध को रूपक बनाकर धरती पर जंगलों और हरियाली को स्थायी पहचान की तरह सहेजने का संदेश देती है। यह कविता पर्यावरण, स्मृति और जीवन के सौंदर्य का हरित घोषणापत्र बन जाती है।

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मैं जब पेड़ लगाता हूँ

प्रकृति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण की सुंदर अभिव्यक्ति है। इसमें कवि ने पेड़ लगाने के आनंद और उससे जुड़ी संवेदनाओं को सहज बालसुलभ भाव में प्रस्तुत किया है। कविता यह संदेश देती है कि पेड़ केवल फल या छाया ही नहीं देते, बल्कि वे मनुष्य और जीव-जंतुओं — सबके जीवन का आधार हैं। दादी के स्नेहिल शब्दों से लेकर झूले पर झूलने की कल्पना तक, हर पंक्ति में प्रकृति के साथ आत्मीय संबंध झलकता है। यह रचना बच्चों में पेड़ों के प्रति प्रेम, जिम्मेदारी और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता जगाने वाली है।

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आईआईएम लखनऊ ने मनाया 41वां स्थापना दिवस

आईआईएम लखनऊ ने अपना 41वां स्थापना दिवस मनाते हुए शिक्षा, सेवा और सांस्कृतिक समावेशन का संदेश दिया। इस अवसर पर आईएएस नेहा प्रकाश ने बतौर मुख्य अतिथि नेतृत्व और सहानुभूति की भूमिका पर प्रकाश डाला। वृक्षारोपण, खेल स्पर्धाएं, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और पुरस्कार वितरण जैसी गतिविधियों से आयोजन को यादगार बनाया गया।

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