जल संरक्षण
प्रकृति बदला नहीं लेती, केवल हिसाब बराबर करती है
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्रस्तुत यह लेख प्रकृति और मानव के संबंधों पर गंभीर चिंतन करता है। इसमें बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वृक्षों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के दुष्परिणामों को रेखांकित करते हुए पर्यावरण संरक्षण को प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व बताया गया है। लेख यह संदेश देता है कि प्रकृति बदला नहीं लेती, बल्कि समय आने पर अपने साथ किए गए व्यवहार का हिसाब बराबर करती है।
प्रकृति की चेतावनी
“प्रकृति की चेतावनी” धरती माँ की ओर से मानवता को दिया गया एक मार्मिक संदेश है। कविता में वृक्षों की कटाई, नदियों की दुर्दशा, पिघलते ग्लेशियर और पर्यावरण संकट की गंभीरता को उजागर किया गया है। यह रचना मनुष्य को चेताती है कि यदि समय रहते प्रकृति का संरक्षण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे।
मछलियाँ…
इन आँखों में बसे असंख्य समंदर कभी हँसी बनकर छलकते हैं, तो कभी अचानक आँसुओं में बदल जाते हैं। जाल से डरती मछलियाँ अतल गहराइयों में खो जाती हैं, जहाँ बिछुड़ने का दुख भी उनके हिस्से आता है। बाज़ार की साज़िशों में उलझा शिकारी सिर्फ़ पकड़ने की भाषा समझता है उसे न जिजीविषा दिखती है, न जीवन की पीड़ा। रंग-बिरंगी मछलियाँ कुछ दिनों का मनोरंजन बनती हैं और फिर गंदे पानी में तड़पकर समर्पित हो जाती हैं। स्वच्छ पानी की अनदेखी में दम तोड़ती मछलियाँ याद दिलाती हैं कि जीवन तभी बचेगा, जब संवेदना बचेगी।
