मैं जब पेड़ लगाता हूँ

प्रकृति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण की सुंदर अभिव्यक्ति है। इसमें कवि ने पेड़ लगाने के आनंद और उससे जुड़ी संवेदनाओं को सहज बालसुलभ भाव में प्रस्तुत किया है। कविता यह संदेश देती है कि पेड़ केवल फल या छाया ही नहीं देते, बल्कि वे मनुष्य और जीव-जंतुओं — सबके जीवन का आधार हैं। दादी के स्नेहिल शब्दों से लेकर झूले पर झूलने की कल्पना तक, हर पंक्ति में प्रकृति के साथ आत्मीय संबंध झलकता है। यह रचना बच्चों में पेड़ों के प्रति प्रेम, जिम्मेदारी और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता जगाने वाली है।

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हरीतिमा

हरीतिमा कविता में कवयित्री ने प्रकृति की सौंदर्यता और उसकी अद्भुत पुनरुत्थान शक्ति को दर्शाया है। अंधड़ में धराशायी हुए वृक्षों के अवशेषों पर फिर से नवपल्लव खिलते हैं, जीवन की जिजीविषा से भरा एक बैंजनी फूलों का कतार उग आता है। कविता यह संदेश देती है कि धरती बिना किसी लेन-देन के अपार स्नेह और जीवन देती है। हरीतिमा का यह निस्वार्थ उपहार कवयित्री के अंतर्मन में कवि के उस अमर वाक्य को बार-बार गूंजने पर विवश करता है – “आ: धरती कितना देती है!”

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