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मैं मरूंगी केवल…

आंधी के बीच खड़ी एक मजबूत महिला, जिसके चारों ओर अंधेरा है लेकिन उसके भीतर से प्रेम की रोशनी निकल रही है।

मौसमी चंद्रा प्रसिद्ध लेखिका

मैं नहीं मरूँगी
किसी पत्थर की ठोकर से,

न उन ऊँची आवाज़ों से
जो मुझे डरा – धमकाकर चुप कराना चाहते हैं

मैं नहीं मरूँगी आधी-अधूरी नींदों से,
जो हर रात मेरी कलम से हारकर ऊंघते रहते हैं

मैं मर ही नहीं सकती उन उदास दुपहरों से
जो बिना तुम्हारे झख मारते हुए कट जाते हैं

कुछ सवालों के नोंक इतने तीखे होते हैं
जिनके छूते भी लोग लहूलुहान हो जाते हैं

मैं हरगिज़ हरगिज़ नहीं मरूंगी उन सवालों से भी!

पर एक दिन
जब प्रेम अपने पूरे सच के साथ आएगा…

मैं उसी में ढह जाऊँगी…
हां! मैं मरूँगी तो सिरफ़ और सिरफ़ प्रेम से!

2 thoughts on “मैं मरूंगी केवल…

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