आत्मबल
मैं मरूंगी केवल…
यह कविता एक स्त्री के भीतर के साहस को दर्शाती है, जो हर डर और दर्द से ऊपर उठकर केवल सच्चे प्रेम में समर्पित होना जानती है।
गुसलखाने की दीवार
यह रचना बताती है कि कभी-कभी जीवन के कठिन क्षणों में एक निर्जीव वस्तु भी हमारा सबसे बड़ा सहारा बन जाती है।
चलता चल राही
चलता चल राही” एक प्रेरणादायक कविता है, जो बताती है कि जीवन की राह में कांटे, बाधाएँ और संघर्ष आएँगे, लेकिन रुकना नहीं बस चलते रहना ही विजय का मार्ग है।
कठिन रास्ते, सुंदर मंज़िलें…
“उसके प्लान पर विश्वास रखना” एक प्रेरक रचना है जो जीवन की कठिन परिस्थितियों को ईश्वर की गहरी योजना के रूप में देखने का दृष्टिकोण देती है। यह रचना सिखाती है कि असफलता, दूरी और अभाव भी हमें मज़बूत, जागरूक और कृतज्ञ बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं।
काँच नहीं, अब धार हूँ
कभी किसी दिन जीवन की भाग-दौड़ से पल चुराकर मैं अपनी ही बनाई शांति में बैठूँगी। फूलों, पेड़ों और परिंदों की चहचहाहट के बीच मैं खुद को सुनूँगी और तब समझ आएगा कि सबसे बड़ा सहारा मैं स्वयं रही हूँ। टूटकर भी जिसने खुद को समेटा, वही मेरी असली पहचान है।
जीत
हार को स्वीकार करने का साहस ही सच्ची जीत की शुरुआत होता है। जो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी अपना संयम और आत्मविश्वास बनाए रखता है, वही आगे चलकर मंज़िल तक पहुँचता है। रास्ते आज कठिन लग सकते हैं, पर यदि हौसलों से भरी कोशिश जारी रहे तो कल वही रास्ते सफलता की ओर ले जाते हैं। गिरना जीवन का स्वभाव है, पर हर बार गिरकर उठना और फिर आगे बढ़ना ही संघर्ष की असली पहचान है।
हमने सीख लिया जीना
ज़िंदगी के ज़ख्मों में भी मुस्कुराना हमने सीख लिया है. अपनों के दिए हुए ज़हर के घूंट को पीकर भी अब हमें जीने की आदत हो गई है. हमने हंसी में अपने दर्द को छिपाना और दिल में ग़मों को दबाना सीख लिया है. अपनों के धोखे और वार से खुद को संभालना और दूसरों का हमदर्द बनकर उनके ज़ख्मों पर मरहम लगाना भी आ गया है. घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर जब हमने सांस ली, तब दुनिया की मक्कारी और चालें पढ़ना सीख लिया. इस काँटों से भरी बस्ती में रहकर भी हमने दूसरों तक खुशबू पहुँचाना सीख लिया. हमें अब यह भी समझ आ गया है कि मां-बाप के सिवा कोई सच्चा हितैषी नहीं होता, इसलिए दुनिया से थोड़ा किनारा करना भी हमने सीख लिया है.
कीचड़ और झंझटों से भरी इस दुनिया में रहते हुए हमने खुद को ईश्वर भक्ति में चमकाना सीख लिया है. अब दर्द भी हमें डराता नहीं, क्योंकि हमने सचमुच “जीना” सीख लिया है.
जीना इसी का नाम है..
क्या जीवन में सहज हो जाना वास्तव में इतना आसान होता है? क्या गिरकर, रोकर चुप हो जाना सरल होता है? कुछ पाकर उसे खो देना, कठिन समय में भी मजबूत बने रहना — यह सब आसान नहीं होता। खासकर एक स्त्री के लिए, जो सही होते हुए भी चुपचाप गलत सुनी जाती है, मूक रह जाती है। फिर भी, स्त्रियाँ यह सब सहती हैं, चोट खाकर भी मुस्कुराना सीख जाती हैं। उनके लिए जीना बस यूँ ही गुनगुनाते हुए आगे बढ़ते रहना है, क्योंकि असल में — जीना इसी का नाम है।
- 1
- 2
