गुसलखाने की दीवार

बाथरूम की सफेद टाइल्स पर सिर टिकाकर रोती महिला, तन्हाई और भावनात्मक दर्द का प्रतीक बाथरूम की सफेद टाइल्स तन्हाई और भावनात्मक दर्द का प्रतीक

कंचनमाला अमर “उर्मी” नई दिल्ली

गुसलखाने की दीवार की वे सफेद टाइल्स,
जिन पर अपना सिर टिकाकर मैं बरसों रोई।

वही एकमात्र चश्मदीद हैं मेरे उस अथाह दर्द की,
जो तुम्हारे अचानक जाने के बाद मुझे मिला।

आज भी वे सफेद टाइल्स मुझे सबसे करीबी लगती हैं,
जिनकी टेक लेकर मैंने अपने भीतर के सैलाब को बाहर निकाला।

उन्होंने कभी अपना कंधा नहीं झटका,
तटस्थ खड़ी रहीं।
उस वक्त उनकी तटस्थता ने मेरी वेदना को सहलाया।

आज जब मैं बहुत हद तक उस अवस्था से उबर चुकी हूँ
कभी-कभी जाकर उन्हें चूम लेती हूँ,
और धन्यवाद कहती हूँ।

मैंने हमेशा तुमसे कहा-
तुम्हारे सिवा मुझे कभी किसी से प्रेम नहीं हुआ, और न होगा।

मगर मुझे फिर से प्रेम हुआ
गुसलखाने की उन्हीं सफेद टाइल्स से।

इस बार मैंने सजीव को नहीं, निर्जीव को चुना।
उनकी तटस्थता ने मुझे संबल दिया।

अथाह दुख से हम खुद-ब-खुद कहाँ निकल पाते हैं,
कोई न कोई तो होता ही है जो हमें सहारा देता है।
कभी-कभी वह संबल देने वाला कोई व्यक्ति नहीं,
किसी निर्जीव वस्तु की तटस्थ चेतना भी हो सकती है
यह मैंने पहली बार जाना।

लेखिका के बारे में-

कंचनमाला ‘अमर’ (उपनाम: उर्मी) 
एक बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार एवं शिक्षिका हैं, जो नई दिल्ली के राजकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में विज्ञान विषय का अध्यापन करती हैं। उन्होंने M.Sc. (रसायन शास्त्र), M.Ed, M.A (कंठ संगीत) तथा B.A (कत्थक नृत्य) की उच्च शिक्षा प्राप्त की है और वर्तमान में शिक्षा शास्त्र में शोधरत हैं।
उनका एकल काव्य संग्रह “इसी रहगुज़र से” सहित कई साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं तथा अनेक प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें माखनलाल चतुर्वेदी नव उदय साहित्य सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।


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