
मेघा अग्रवाल, प्रसिद्ध लेखिका, नागपुर (महाराष्ट्र)
ज़ख्मों में भी हमने मुस्कुराना सीख लिया,
अपनों के जहर का घूंट पीना सीख लिया।
हंसी में दर्द को छुपाना सीख लिया,
ग़मों को दिल में दबाना सीख लिया।
अपनों के घात से खुद को बचाना सीख लिया,
औरों का हमदर्द बनकर मरहम लगाना सीख लिया।
घर की चारदीवारी से निकल कर सासं ली हमने,
दुनिया की मक्कारी पढ़ना सीख लिया।
काँटों की इस बस्ती में रहकर हमने,
दूसरों को खुशबु पहुँचाना सीख लिया।
मां-बाप के सिवा कोई होता़ नहीं हितेशी ,
दुनिया से हमने किनारा करना सीख लिया।
कीचड़ में रहकर झमेलों झंझटों से
हमने,
ईश्वर भक्ति में खुद को चमकाना सीख लिया।

Bahut badhiya megha ji
आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद, इसी तरह आपका स्नेह बना रहे
– सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
बहुत खूब
आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद, इसी तरह आपका स्नेह बना रहे
– सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
मेघा जी
आपने बहुत अर्थपूर्ण और संवेदनशील लिखा है ।
घर की चारदीवारी से निकल कर सासं ली हमने,
दुनिया की मक्कारी पढ़ना सीख लिया।
काँटों की इस बस्ती में रहकर हमने,
दूसरों को खुशबु पहुँचाना सीख लिया।
एसे ही अपने मन की आवाज को कलमबद्ध करती रहिये ।