हमने सीख लिया जीना

ज़िंदगी के ज़ख्मों में भी मुस्कुराना हमने सीख लिया है. अपनों के दिए हुए ज़हर के घूंट को पीकर भी अब हमें जीने की आदत हो गई है. हमने हंसी में अपने दर्द को छिपाना और दिल में ग़मों को दबाना सीख लिया है. अपनों के धोखे और वार से खुद को संभालना और दूसरों का हमदर्द बनकर उनके ज़ख्मों पर मरहम लगाना भी आ गया है. घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर जब हमने सांस ली, तब दुनिया की मक्कारी और चालें पढ़ना सीख लिया. इस काँटों से भरी बस्ती में रहकर भी हमने दूसरों तक खुशबू पहुँचाना सीख लिया. हमें अब यह भी समझ आ गया है कि मां-बाप के सिवा कोई सच्चा हितैषी नहीं होता, इसलिए दुनिया से थोड़ा किनारा करना भी हमने सीख लिया है.

कीचड़ और झंझटों से भरी इस दुनिया में रहते हुए हमने खुद को ईश्वर भक्ति में चमकाना सीख लिया है. अब दर्द भी हमें डराता नहीं, क्योंकि हमने सचमुच “जीना” सीख लिया है.

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प्रकृति…

प्रकृति हर पल हमें कुछ न कुछ सिखाती रहती है। ठंडी हवाएँ हमें कहती हैं कि चलते रहो, कभी मत रुको और अपना लक्ष्य पाकर ही ठहरो। चहचहाते पक्षी यह संदेश देते हैं कि परिस्थितियाँ जैसी भी हों, मुस्कुराते रहो और जीवन का आनंद लो। घड़ी की टिक-टिक हमें याद दिलाती है कि समय की कद्र करो, क्योंकि एक बार बीता हुआ वक्त कभी लौटकर नहीं आता। रिमझिम बारिश की बूँदें सब्र करने का पाठ पढ़ाती हैं और बताती हैं कि धैर्य का फल सदैव मीठा होता है। वहीं, जगमगाते जुगनू यह सीख देते हैं कि अंधेरों में भी रोशनी तलाशनी चाहिए। सच तो यह है कि प्रकृति अनजाने में ही हमें जीवन के गहरे सत्य सिखा देती है, लेकिन अक्सर हम इंसान इतने नासमझ होते हैं कि उन्हें समझ नहीं पाते।

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