ईश्वर पर विश्वास

शारदा कनोरिया शुभा, वरिष्ठ लेखिका, पुणे (महाराष्ट्र)

संपूर्ण हृदय से प्रभु पर विश्वास रखो, और अपनी बुद्धि पर निर्भर मत रहो; अपने सभी मार्गों में उसे मानो, और वह तुम्हारे पथ को सीधा करेगा।”
“Trust in God” हमें भीतर की श्रद्धा जगाने का संदेश देता है। ईश्वर पर विश्वास का अर्थ केवल यह मानना नहीं कि वह है, बल्कि यह अनुभव करना है कि वह सदा हमारे साथ है, हमारे भीतर है।

गुरु अर्जन देव जी कहते हैं:
“तू मेरा पिता, तू मेरी माता, तू मेरा सखा, तू मेरा पालनहार है।”
जब यह भाव जागता है, तब जीवन में हर परिस्थिति सहज हो जाती है। विश्वास का अर्थ है अपने अहंकार और नियंत्रण की भावना को छोड़कर उसकी इच्छा में चलना। ईश्वर में भरोसा रखने वाला व्यक्ति जानता है कि जो भी हो रहा है, वही हमारे कल्याण के लिए है।

जब हम समर्पण करते हैं, तो भय और चिंता मिट जाते हैं, और मन में शांति, स्थिरता और संतोष का उदय होता है। ईश्वर पर विश्वास एक भावना नहीं बल्कि एक जीवन दृष्टि है, जो अंधकार में भी हमारे पथ को प्रकाशित कर देती है। मनुष्य का जीवन परिस्थितियों का संगम है; कभी सुख की लहरें उसे आलोकित करती हैं, तो कभी दुख की आँधियाँ उसे हिला देती हैं। जीवन जब सहज और सुंदर प्रतीत होता है, तब ईश्वर पर विश्वास सहज रूप से उमड़ आता है; परंतु जब चारों ओर अंधकार छा जाता है, तब यही विश्वास परीक्षा में उतरता है।

मैंने स्वयं कई बार अनुभव किया है कि जब जीवन में सब कुछ बिखरता-सा लगता है, तब प्रार्थना ही सबसे सशक्त सहारा बनती है। मनुष्य अपनी सीमाओं से परे जाकर जब प्रभु से संवाद करता है, तो उसका बोझ हल्का हो जाता है। हम चाहे कुछ न कर पाएँ, पर जब अपनी चिंता को प्रार्थना में रख देते हैं, तब वह चिंता हमारी नहीं रह जाती, वह ईश्वर की हो जाती है।

संत कबीर की वाणी अनायास याद आती है:
“राख पित प्रभु मेरे, मैं निर्गुण सब गुण तेरे।”अर्थात्, “हे प्रभु, हे पिता, मैं तो निर्गुण हूँ, परंतु सारे गुण आपके हैं, मुझे अपनी छाया में रखिए।”यह surrender ही तो विश्वास का चरम रूप है। जब हम ईश्वर की इच्छा को अपना मान लेते हैं, और उनके प्रेम में निहित शांति को स्वीकार कर लेते हैं।विश्वास का प्रभाव केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी होता है। ईश्वर पर भरोसा रखने वाले व्यक्ति में यह परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है। आंतरिक शांति और आनंद बाहरी परिस्थितियों से नहीं, भीतर से संतुष्ट रहते हैं। कठिन समय में भी उसका मन डगमगाता नहीं; उसे पता होता है कि “यह भी प्रभु की योजना का भाग है।”

ईश्वर उसके जीवन के मार्गदर्शक बन जाते हैं, जिनकी दिशा में चलना ही सुरक्षित लगता है। वह जानता है कि प्रभु उसकी आवश्यकताओं को समय पर पूरी करेंगे। ऐसा व्यक्ति अकेला नहीं रहता; उसका विश्वास ही उसकी संगति बन जाता है।ईश्वर पर विश्वास रखना एक निरंतर अभ्यास है। यह न तो अंधी आस्था है, न किसी भय की उपज, बल्कि यह आत्मा की वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति यह अनुभव करता है कि “मैं अकेला नहीं हूँ, मेरे साथ परम शक्ति है।”जब हम सुनना सीखते हैं, तो हमें भीतर से एक कोमल स्वर सुनाई देता है। वही ईश्वर का फुसफुसाता हुआ संदेश होता है, जो कहता है, “मत डरो, मैं तुम्हारे साथ हूँ।”

ईश्वर पर यह भरोसा ही हमें हर परिस्थिति में संतुलन, सामर्थ्य और शांति देता है। यही विश्वास हमें ईश्वर के सान्निध्य में ले जाकर जीवन को अर्थपूर्ण बनाता है। ईश्वर पर विश्वास रखिए, क्योंकि वही शक्ति हमें टूटने से बचाती है, और वही प्रेम हमें संभालता है। आपका प्रत्येक दिन ईश्वरमय, शांत और आनंदमय हो।

2 thoughts on “ईश्वर पर विश्वास

  1. प्रेरणा दायक लेख । ईश्वर में आस्था ही समाधान है सांसारिक चिंताओं से मुक्त होने का।

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