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प्रार्थना में लीन एक व्यक्ति शांत वातावरण में ध्यानमग्न बैठा हुआ, आत्मिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करता हुआ।

मन की औषधि: प्रार्थना

प्रार्थना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मनुष्य और ईश्वर के बीच आत्मीय संवाद का माध्यम है। यह मानसिक शांति, आत्मविश्वास, कृतज्ञता और सकारात्मक सोच को विकसित कर जीवन को संतुलित एवं सार्थक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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वीणा धारण किए श्वेत कमल पर विराजमान माँ सरस्वती का दिव्य और शांत स्वरूप।

सरस्वती वंदना

हे स्वामिनी, ज्ञानदायिनी, भक्ति-प्रकाश उर में भर दे। माँ सरस्वती से ज्ञान, विवेक, संयम और शुद्ध लेखनी का वरदान माँगती यह सुंदर वंदना मन को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देती है।

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मंदिर में हाथ जोड़कर प्रार्थना करता भक्त, पीछे जलते दीपक और दिव्य प्रकाश

प्रभु का प्रसाद

“प्रभु का प्रसाद” एक सुंदर भक्ति कविता है जिसमें ईश्वर से आशीर्वाद, प्रेम, सुख और मंगल विचारों की कामना की गई है। यह रचना मानव जीवन में भक्ति, करुणा और सकारात्मकता का संदेश देती है।

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हवा का झोंका

हवा का वह झोंका, जो अपना रास्ता भूलकर आँगन में आया, जैसे पूरी जगह को जीवित कर दिया। मैं चुपचाप एक कोने में खड़ी थी, पास वाले घर से प्रार्थना की धुन कानों में गूंज रही थी। ठंडी हवा, टिमटिमाता दिया, और सुगंधित समय सब मिलकर उस पल को शांति और प्रकाश से भर देते थे। हर लम्हा जैसे सपनों का गीत गा रहा हो, और मेरी आत्मा भी उसी संगीत में घुलमिल रही हो।

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ईश्वर पर विश्वास

संपूर्ण हृदय से प्रभु पर भरोसा रखें और अपनी बुद्धि पर निर्भर न रहें। जीवन में चाहे सुख हो या दुख, भय और चिंता को त्यागकर ईश्वर की इच्छा में चलना ही सच्चा विश्वास है। प्रार्थना और समर्पण के माध्यम से हम आंतरिक शांति, स्थिरता और संतोष प्राप्त कर सकते हैं। ईश्वर पर भरोसा केवल आध्यात्मिक अनुभव नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक शक्ति भी देता है। जब हम अपनी चिंताओं को प्रार्थना में छोड़ देते हैं, तब हमारा बोझ हल्का होता है और हम जानते हैं कि हम अकेले नहीं हैं।

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दिल को छूती मौन की गूँज…

“निशिगंधा की महक से जग उठा संसार, आंखों में बह रही गंगा और यमुना की धाराएँ। मिट्टी के दीपों की रौशनी में प्रार्थना और शांति पंचतत्व में विलीन हो रही हैं, और एक गीत हर दिल को छूते हुए गूँज रहा है।”

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भोर की प्रतीक्षा…

जाने कितने जंगलों को पार करती उसकी साँसें मेरे कानों से टकराई थीं। जैसे उसकी डूबती साँसें मुझे पुकार रही हों। मैं और मेरी साँसें उस निराकार ब्रह्मांड के शरणागत थे।एक कवियित्री की आँखों में खारे अश्क़ों की गहरी तरलता भरी थी। उन अश्क़ों ने मानो किसी देव के चरण पखारने की ठान ली थी। विशालकाय, हहराती गंगा में मेरे चंद खारे आँसू भी प्रार्थना में लीन थे।

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