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हवा का झोंका

रेखा हजारिका, प्रसिद्ध असमिया लेखिका, लखीमपुर (आसाम)

हवा का एक झोंका
अपना रास्ता भूल कर
मेरी आँगन की ओर मुड़ा|

हँसने-हँसाने के पौधों से
ऐसे घुल-मिल गया
कि सारा आँगन झूम उठा|

मैं चुपचाप खड़ी थी
एक कोने में|
पास वाले घर से
एक प्रार्थना की गूँज|

धुन में एक टिमटिमाता दिया,
ठंडी हवा का झोंका,
और मैं शांति से खड़ी थी|

समय सुगंधित था,
आत्मा प्रकाशमय थी|
हर लम्हा जैसे
सपनों का गीत गा रहा हो|

3 thoughts on “हवा का झोंका

  1. हवा का झोंका धनी और निर्धन का घर नहीं जानता । वह घर की शांतिपूर्ण प्रार्थनाएँ सुनता है ,दिए का टिमटिमाना निहारता है पर उसे बुझाता नहीं । सुगन्ध को बिखेरता है ।
    बहुत सादगीपूर्ण वर्णन।

  2. आपकी पोस्ट पढ़कर मुझे स्कूल की एक हिंदी साहित्य की कविता याद आ गई हवा हूं हवा में बसंती हवा हूं(केदारनाथ अग्रवाल)जी की रचना जो उन्होंने बसंत के आगमन पर लिखा था।
    बेहद सुंदर शब्दों में पिरोया है आपने।

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