
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज
कक्षा आठवीं पास करते ही महिदपुर रोड के हायरसेकंडरी स्कूल में दाख़िला हो गया था.जिले की मेरिट लिस्ट में दूसरा स्थान आया था, इसलिए नाम पहले ही पहुँच चुका थाबिना पहुँचे ही.सबको तय लग रहा था कि अब साइंस और मैथ्स ही पढ़ेगा, और मुझे भी.स्कूल सरकारी था, यूऩिफॉर्म की कोई बाध्यता नहीं थी.पर विकल्प होना और साधन होनाये दो अलग बातें होती हैं.मेरे पास तो वही पुरानी हॉफ पेंट और शर्ट थी. सो उसी हॉफ पेंट में स्कूल जाना शुरू किया.
शरीर दुबला-पतला, उम्र से छोटा दिखने वाला हॉफ पेंट तब तक सवाल नहीं बनी थी. लेकिन आधा साल बीतते-बीतते एक दिन हिंदी के शिक्षक रामनारायण यादव सर की नज़र मुझ पर ठहर गई. उन्होंने पहले मेरी ऊँचाई देखी फिर मेरी निकर. कुछ कहा नहीं.. पर उस चुप्पी ने बहुत कुछ कह दिया. मैं समझ गया..अब यहाँ निकर नहीं चलेगी.उस दिन के बाद मन ने खुद से एक वादा कर लिया
अब हॉफ पेंट नहीं पहनूँगा. लेकिन सवाल था. फुल पेंट आएगी कहाँ से?
पिताजी शुक्रवार की हाट से ही कपड़े दिलवाते थे. निकर सात से बारह रुपये की आती थी. मंदसौर से आने वाले टोपी वाले बा उन्हीं से. पूरा इलाका उन्हीं पर भरोसा करता था. कमलेश चौधरी, अनिल पोरवाल, उज्जैन वाले अनिल पोरवाल, राकेश कोचर मावावाला, राजराम नवघाणे, राजेश कांठेड़ (मेडिकल) सबकी हॉफ पेंट वहीं से आती थी. लेकिन अब बात हॉफ पेंट की नहीं थी…अब बात इज़्ज़त की थी खुद की नज़रों में.
इसी बीच छात्रवृत्ति मंज़ूर हुई. पूरे एक सौ पैंतालीस रुपये. ज़िंदगी में पहली बार इतने पैसे…मेरे नाम से आए थे. सबसे पहले चमड़े की चप्पल बनवाई…महिदपुर रोड की चमड़े की चप्पलें उस ज़माने में अपनी चमक के लिए जानी जाती थीं.
पैंतालीस रुपये में..एकदम चमचमाती चप्पल.पैरों में पहनते ही लगता था जैसे ज़मीन भी कुछ और हो गई हो. पर असली सवाल अब भी सामने खड़ा था..निकर की जगह पेंट. भगत दा (प्रहलाद जी धारविया) के यहाँ से गेवर्डिन कपड़ा लिया गया. वही कपड़ा जो उस समय सम्मान की पहचान था.सिलाई के लिए कपड़ा पहुँचा. उन्हेल वाले राजेश टेलर्स कैलाशचंद्र जी के यहाँ जो महिदपुर रोड के सबसे मशहूर टेलर लेडीज़ और जेंट्स, दोनों के थे. नाप लिखवाया और फिर एक नई बहस पेंट में बटन होंगे या चेन?
उन दिनों बटन ही चलते थे. लेकिन राजेश टेलर्स पहले टेलर थे. जिन्होंने बटन की जगह चेन लगानी शुरू की. मेरे लिए वो सिर्फ चेन नहीं थी. वो थोड़ा-सा आगे बढ़ जाना था. काफी सोच-विचार के बादपेंट तैयार हुई. वो मेरी इकलौती पेंट थी. हर सुबह धोकर, सुखाकर,खुद प्रेस करके पहनी जाती. गंदी होती तो शाम को धोई जाती, सुबह फिर उसी की इस्त्री.
एक ही पेंट मेंहम स्कूल ऐसे पहुँचते जैसे कोई राजा बाबू आ गया हो. एक दिन जल्दबाज़ी में पेंट का बेल्ट हिस्सा थोड़ा गीला रह गया. लेकिन स्कूल देर से नहीं पहुँचना था. इस्त्री जल्दी गर्म हो इस चक्कर में कोयले में ज़रूरत से ज़्यादा घासलेट डाल दिया.
प्रेस भभक गई.और हाथ जल गया. दर्द हुआ…पर उससे ज़्यादा डर इस बात का था..कि कहीं पेंट जल न जाए.
हाथ का वो निशान..आज भी मौजूद है. वो सिर्फ जला हुआ मांस नहीं वो उस दौर की मोहर है..जब सपने बड़े थे…और साधन बहुत छोटे. वो इकलौती पेंट..आज अलमारी में नहीं है, लेकिन उसकी सिलवटें.. अब भी स्मृतियों में करीने से रखी हैं.. गर्म इस्त्री की तरह..जो आज भी भीतर कहीं.. हल्की-सी चुभन छोड़ जाती है.
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यादों को बेहतरीन तरीके से, करीने से सजाकर प्रस्तुत करना, जिसे पढ़कर , पाठक भी उस दौर में चला जाता है।
अपनी सभी यादों को पिरोकर एक पुस्तक बना लीजिए ।
साधन, सुविधा,
फिर भी रहेगी दुविधा
कुछ यादें दिल के करीब होते हैं हम उन्हें अपनी यादों से मिट नहीं सकते ।आपने बहुत ही खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है ।
कुछ यादें हमेशा रहती हैं । कभी चुभती हैं, कभी प्रेरित करती हैं। बचपन की स्मृति को बहुत सुंदर शब्दों में पिरोया है आपने । ढ़ेरो बधाई।
बहुत सुंदर यादें,
, लेकिन बचपन में पता ही नहीं चलता था कि वो कठिन दौर हैं और आज उन यादों को याद करके हम कभी हंसते हैं और कभी उदास हो जातें हैं, बहुत सुंदर संस्मरण
बीते जमाने का जो मर्मस्पर्शी खाका आपने तैयार किया है वो बेहद शानदार है। यह संस्मरण हमें सोचने पर विवश कर देता है कि बीते जमाने में हमारी खुशियां कैसी छोटी-छोटी चीजों में समाई रहती थी उनका मूल्य हमें पता था हमें अपनी चादर की सीमा का अंदाजा हुआ करता था। बहुत ही शानदार और मर्म स्पर्शी संस्मरण
दिल को छू लेने वाली। सच में तब साधन कम थे पर खुशियां ज्यादा थी और मेहनत मशक्कत भी ज्यादा थी। बावजूद इसके हर पल खुशी से चेहरे दमकते थे। ये वो सपने थे जो हमारी आँखों में चमकते थे…
दिल को छू लेने वाली संस्मरण 👌👌
ह्रदय स्पर्शी