खेत में थ्रेसर मशीन के साथ काम करते थके हुए मजदूर, जोखिम भरा माहौल

रोटी की दौड़ में मौत का खतरा: थ्रेसर बन रहा काल

श के ग्रामीण इलाकों में गेहूं की कटाई और मड़ाई के दौरान थ्रेसर मशीनों का उपयोग तेजी से बढ़ा है। जहां ये मशीनें किसानों की मेहनत को आसान बनाती हैं, वहीं इनके कारण होने वाले हादसों में भी लगातार वृद्धि देखी जा रही है। यह घटनाएं केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे कई परिवारों का दर्द और टूटते सपने छिपे होते हैं।

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ग्रामीण बच्चों के साथ प्रदीप लोखंडे, पोस्टकार्ड मैन ऑफ इंडिया

पोस्टकार्ड से जागा ग्रामीण भारत

पुणे के सामाजिक उद्यमी प्रदीप लोखंडे ने पोस्टकार्ड और पुस्तकों के माध्यम से ग्रामीण भारत में पढ़ने की संस्कृति विकसित की और लाखों बच्चों का भविष्य बदला।

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वह इकलौती पेंट और गर्म इस्त्री

वो मेरी इकलौती पेंट थी। रोज़ धोकर, सुखाकर, इस्त्री करके पहनी जाती। एक ही पेंट में हम स्कूल ऐसे पहुँचते जैसे राजा बाबू हों। एक दिन जल्दी में गर्म इस्त्री से हाथ जल गया, लेकिन दर्द से ज़्यादा डर इस बात का था कि कहीं पेंट न जल जाए। उस जलन का निशान आज भी है संघर्ष की याद बनकर।

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दिया और कुम्हार

कविता उस कुम्हार की करुण कथा कहती है, जो मिट्टी के दिये बनाकर दुनिया के हर घर में उजाला फैलाता है, पर उसका अपना जीवन अंधकार में डूबा रहता है। वह दिन-रात मेहनत करता है ताकि अपनी बेटी की पढ़ाई, विवाह, माता-पिता की दवा और दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम कर सके। फिर भी लोग उसके परिश्रम की कीमत पर सौदा करते हैं, मानो एहसान कर रहे हों। त्योहार की चमक में उसकी मेहनत की सच्चाई गुम हो जाती है।

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सिस्टम, सिस्टमैटिकली बच निकला..

तो ख़बर ये है, मित्र… कि सिस्टम हमेशा की तरह सिस्टमैटिकली अपने बाल भी बाँका किए बिना फिर से बच निकला है, जैसे उसे संविधान की किसी फुटनोट में कोई स्पेशल छूट मिली हो.
एक बार फिर, एक स्कूल की छत ढह गई और हमेशा की तरह, मासूम बच्चे ढहती दीवारों के नीचे दब गए. कुछ घायल हुए, कुछ अनंत यात्रा पर निकल लिए…
आप कहेंगे, ऐसी तो और भी इमारतें ध्वस्त हुई हैं भूस्खलन हुआ, बाढ़ आई, करंट लगने से भी अच्छे-खासे जान और माल की हानि हुई फिर आप इस एक सरकारी इमारत के पीछे क्यों पड़े हैं?
बस इसीलिए कि ये सरकारी थी.
सरकार इधर खुद की जोड़-तोड़ में लगी है. एक बार फिर आपने उसे व्यस्त कर दिया ङ्गहमें दुःख हैफ की बजरी, ङ्गदोषियों को बख्शा नहीं जाएगाफ के सीमेंट और सरकारी ब्रांड के मगरमच्छी आँसुओं का पानी मिलाकर एक गाढ़ा लेपन तैयार हुआ है जिससे की जाएगी लीपापोती.

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रामलीला: एक प्रतीक्षा, एक परंपरा, एक अपनापन

साल 1977 की यह रामलीला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि महिदपुर रोड की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान थी। रंग-बिरंगे पर्दों, अनुशासनपूर्ण व्यवस्था और जीवंत पात्रों वाली यह रामलीला आज भी स्मृतियों में जीवित है, जब लोग दोपहर में ही रात की सीट बुक करने चले जाते थे, और हनुमानजी का प्रसाद पूंछ से मिलता था।

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भय

“अब का भूल जाओ सब और अपनी छोटी बेटी पर ध्यान दो” — कहकर मातादीन छोटे ठाकुर की गाड़ी चलाने चला गया। राधा की मौत से टूटा, मगर डर से बंधा बाप अपने आंसू निगल गया। ये सिर्फ़ एक बेटी की कहानी नहीं, पूरे सिस्टम की चुप्पी की चीख़ है, जहां ज़िंदगी से ज्यादा बड़ी होती है रोटी की मजबूरी और डर।

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