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पोस्टकार्ड से जागा ग्रामीण भारत

ग्रामीण बच्चों के साथ प्रदीप लोखंडे, पोस्टकार्ड मैन ऑफ इंडिया pradeep lokhnde

प्रदीप लोखंडे: जिन्होंने किताबों से बदली लाखों बच्चों की तक़दीर

हेमा म्हस्के, प्रसिद्ध लेखिका, पुणे की रिपोर्ट

जब डिजिटल दौर में संदेश एक क्लिक में भेजे और मिटाए जा रहे हैं, ऐसे समय में पुणे के प्रदीप लोखंडे ने एक लगभग भुला दिए गए माध्यमपोस्टकार्डको सामाजिक परिवर्तन का औज़ार बना दिया. यही वजह है कि आज वे देशभर में पोस्टकार्ड मैन ऑफ इंडिया और मैन ऑफ लाइब्रेरी के नाम से जाने जाते हैं.
प्रदीप लोखंडे का जीवन संघर्ष और संकल्प की मिसाल है. उनका बचपन ग़रीबी में बीता. पढ़ाई का शौक था, लेकिन किताबें खरीदने के लिए पैसे नहीं होते थे. शायद उसी अभाव ने उनके भीतर यह बीज बो दिया कि भविष्य में कोई भी बच्चा स़िर्फ पैसों की कमी के कारण ज्ञान से वंचित न रहे. मार्केटिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे कॉरपोरेट सेक्टर से जुड़े. इसी दौरान देश के विभिन्न ग्रामीण इलाकों में काम करते हुए उन्होंने महसूस किया कि गांवों में शिक्षा की सबसे बड़ी कमी किताबों और पढ़ने की संस्कृति की है. यहीं से जन्म हुआ उनकी अनोखी पहल ज्ञान की लाइब्रेरी.
पोस्टकार्ड बना संवाद का पुल
लोखंडे ने लाइब्रेरी को स़िर्फ किताबों का कमरा नहीं बनाया, बल्कि उसे संवाद का केंद्र बनाया. हर किताब के साथ एक पोस्टकार्ड रखा गया. छात्र किताब पढ़ते हैं और उस पर अपनी प्रतिक्रिया पोस्टकार्ड में लिखते हैं. पता स़िर्फ इतना प्रदीप लोखंडे, पुणे-13. और चिट्ठी पहुँच जाती है. आज तक देशभर के गांवों से 8 लाख 50 हज़ार से अधिक पोस्टकार्ड उनके पास पहुँच चुके हैं. ये पोस्टकार्ड किसी बच्चे की खुशी, किसी के आत्मविश्वास और किसी के बदले हुए सपने की कहानी कहते हैं. इनमें से 2.65 लाख पोस्टकार्ड सुरक्षित रखे जा चुके हैं. मानो वे ग्रामीण भारत की धड़कन हों.
आंकड़े नहीं, असर बोलता है
पिछले 25 वर्षों में प्रदीप लोखंडे और उनकी संस्था रूरल रिलेशन्स ने 10 राज्यों के 18,400 ग्रामीण स्कूलों में 28,300 कंप्यूटर लगवाए.6,000 से अधिक ज्ञान की लाइब्रेरियां स्थापित कीं,14 लाख से अधिक उपयोगी किताबें दान में पहुंचाईं तथा 10 लाख से ज़्यादा बच्चों को पढ़ने का अवसर दिया. इन लाइब्रेरियों में केवल पाठ्यपुस्तकें ही नहीं, बल्कि भारतीय संविधान, प्रबंधन, आपदा प्रबंधन, संगीत, नाटक, सामाजिक विज्ञान और सेक्स एजुकेशन जैसी किताबें भी शामिल हैं. सरल मॉडल, गहरा प्रभाव
लोखंडे बताते हैं कि एक लाइब्रेरी स्थापित करने के लिए दानदाता को स़िर्फ 6,700 रुपये का चेक प्रकाशक के नाम देना होता है. किताबें सीधे स्कूल पहुँच जाती हैं. पारदर्शिता और भरोसे का यही मॉडल इस पहल की सबसे बड़ी ताक़त है.
पढ़ने से बदलता है जीवन
प्रदीप लोखंडे का स्पष्ट विश्वास है कि पढ़ने वाला व्यक्ति प्रबुद्ध होता है. अगर समाज का हर व्यक्ति पढ़ने लगे, तो बदलाव अपने आप आ जाएगा. उनकी सोच स़िर्फ बच्चों तक सीमित नहीं. वे कहते हैंचाहे घरेलू सहायक हो, रिक्शा चालक हो या मज़दूरअगर किताब जीवन का हिस्सा बन जाए, तो सोच बदलती है, और सोच बदलते ही समाज बदलता है.
एक आदमी, एक विचार, लाखों ज़िंदगियां
आज रूरल रिलेशन्स की गतिविधियाँ 49,000 गांवों तक फैल चुकी हैं. प्रदीप लोखंडे ने साबित कर दिया कि बड़े बदलाव के लिए हमेशा बड़ी योजनाओं की नहीं, बल्कि ईमानदार इरादों और निरंतर प्रयास की ज़रूरत होती है.
एक ऐसा व्यक्ति, जिसके पास कभी अपनी किताबें नहीं थीं, आज लाखों बच्चों की लाइब्रेरी बन चुका है.यह स़िर्फ सफलता की कहानी नहीं.यह पोस्टकार्ड पर लिखी हुई उम्मीदों की क्रांति है.

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