
डॉ. मंजरी शुक्ला, जबलपुर
तुम कब आओगे मेरे राम
उस राह पर आज तक
निःशब्द असहाय और अकेली
बैठी हुई पथ के कांटे चुन रही हूँ मैं
जिस पर त्याग गए थे महर्षि गौतम
सदिओं पहले अहिल्या को …
श्राप देकर पाषाण की प्रतिमा
बनाकर मुहँ फेरकर चल दिए
और वो बैठी रही मूर्त रूप में
अपने राम की राह देखती
निश्छल अविचल तटस्थ होकर…
पर मेरी विडंबना देखो
मैं भी वही अहिल्या हूँ
पर हाड़- मांस की चलती फिरती
जिसकी केवल नियति पाषाण की हुई हैं
जिसकी साँसों से उसके
जीवित होने का भ्रम होता हैं
धमनियों में बहता लहूँ प्रमाण देता हैं
कि सभी अंग सुचारू रूप से
अपना -अपना कार्य संपन्न कर रहे है…
पर किसी राम का मुझे इंतज़ार नहीं हैं
क्योंकि तुम्हारे सिवा मेरे मन के
उस रीते,सीले और अँधेरे कोने को कोई कभी
नहीं छू सकेगा ..
तुम कब आओगे मेरे राम ….
लेखिका के बारे में
डॉ. मंजरी शुक्ला
एक सशक्त और बहुआयामी हस्ताक्षर हैं, जिनकी लेखनी में कल्पना की उड़ान, संवेदना की गहराई और संस्कारों की उजास एक साथ दिखाई देती है। 30 मार्च 1977 को लखनऊ में जन्मी डॉ. शुक्ला ने अंग्रेजी साहित्य में पीएच.डी. के साथ-साथ हिंदी साहित्य, शिक्षा और संगीत में भी उच्च अध्ययन किया है, जो उनके सृजन को बहुस्तरीय बनाता है।स्वतंत्र लेखन और आकाशवाणी में उद्घोषक के रूप में सक्रिय डॉ. मंजरी शुक्ला ने बाल साहित्य को अपना मुख्य क्षेत्र बनाया है।
उनकी कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि बच्चों के भीतर जिज्ञासा, संवेदनशीलता और नैतिक मूल्यों का संचार भी करती हैं। छह सौ से अधिक प्रकाशित कहानियों और दो दर्जन से अधिक पुस्तकों के साथ उन्होंने बाल पाठकों के मन में एक विशेष स्थान बनाया है। “स्वीटीज़ रेनी डे”, “जादुई गुब्बारे”, “बिंदकी का स्कूल” और “सुल्तान सुलेमान” श्रृंखला जैसी कृतियाँ उनकी सृजनशीलता का सशक्त प्रमाण हैं।
डॉ. शुक्ला की रचनाएँ देशभर की अनेक पाठ्यपुस्तकों में शामिल हैं और विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाई जाती हैं। उनकी कहानियाँ दृष्टिबाधित बच्चों तक भी कम्युनिटी रेडियो के माध्यम से पहुँचती हैं, जो उनके लेखन की व्यापक सामाजिक उपयोगिता को दर्शाता है। वे न केवल लेखन तक सीमित हैं, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक मंचों पर सक्रिय सहभागिता के माध्यम से बाल साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत डॉ. मंजरी शुक्ला का साहित्यिक सफर समर्पण, सृजन और समाज के प्रति प्रतिबद्धता का जीवंत उदाहरण है। उनकी लेखनी बच्चों के सपनों को शब्द देती है और उन्हें एक उज्जवल, संवेदनशील और सशक्त भविष्य की ओर प्रेरित करती है।
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