माँ: जीवन आधार
यह कविता माँ के उस अथाह प्रेम, त्याग और संघर्ष को समर्पित है, जो अपने बच्चों की खुशियों और भविष्य के लिए हर कठिनाई सहकर भी मुस्कुराती रहती है।

यह कविता माँ के उस अथाह प्रेम, त्याग और संघर्ष को समर्पित है, जो अपने बच्चों की खुशियों और भविष्य के लिए हर कठिनाई सहकर भी मुस्कुराती रहती है।
यह कविता माँ की ममता, उसके संघर्ष, त्याग और बच्चों के लिए उसके अथाह प्रेम को बेहद भावुक और सुंदर शब्दों में प्रस्तुत करती है।
यह कविता माँ के साथ बिताए गए उन अनमोल पलों की स्मृतियों को सजीव करती है, जहाँ ममता, त्याग, अनुशासन और प्रेम की खुशबू हर शब्द में महसूस होती है।
अहिल्या की प्रतीक्षा के रूपक में लिखी यह कविता एक स्त्री के भीतर के पत्थर हो चुके दर्द और अधूरी चाहत की सजीव अभिव्यक्ति है।
मन की थकान वह पीड़ा है, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं होता। “मन थके तो कौन?” कविता इसी अदृश्य दर्द को उजागर करती है, जहाँ तन की बीमारी का इलाज तो मिल जाता है, लेकिन मन के घाव केवल एक सच्चे अपने की उपस्थिति से ही भरते हैं। यह कविता हमें याद दिलाती है कि कभी-कभी सबसे बड़ा सहारा सिर्फ सुनने वाला एक दिल होता है।
वह खुद को अल्हड़ कहती है- हँसती, खिलखिलाती, सबके बीच सहज दिखती हुई। मगर इस सहजता के पीछे एक शांत, गहरा सन्नाटा है, जहाँ उसके अधूरे ख़्वाब और अनकहे दर्द पलते हैं। वह अपने आँसुओं को पलकों में सजा कर रखती है, ताकि दुनिया उसकी मुस्कान ही देखे। रिश्तों की भीड़ में भी वह खुद को खोजती रहती है, हर बार टूटकर फिर संभल जाती है। उसकी कहानी शोर नहीं करती बस धीमे-धीमे महसूस होती है, जैसे रात की तन्हाई में कोई ख़ामोश उजाला।