
अर्पणा सिंह अर्पी, रांची
गर्मी की तपती धूप में
तेरा आम पापड़ बनाना याद आता है।
आमों की ख़ुशबू से, माँ,
तेरे चेहरे की ख़ुशी याद आती है।
सबको उसका बखरा देकर,
कभी आम से भरी टोकरियों से
रस से भरे आम तुमने खाए थे,
मुझे याद नहीं।
थककर शाम को बिस्तर पर आकर
हमसे सेवा कराते हुए,
गिनती, पहाड़े याद कराना,
समय की क़ीमत समझाना
बहुत याद आता है।
माँ, क्या तुम्हें कभी
परिस्थितियों से जूझते हुए
उबन नहीं होती थी?
क्या कभी ज़िम्मेदारियों से
मुँह मोड़ने का मन नहीं करता था?
क्या कभी पिताजी से
ज़रूरतों को पूरा करने की
फ़रमाइश करने का
तुम्हारा दिल नहीं करता था?
कितनी सहनशीलता और
धैर्य भरा था तुममें।
हर कठिनाई से निकलने का
रास्ता आता था तुम्हें।
रसोई का काम निपटाते-निपटाते
हमारी ग़लतियों को सुधार जाना
याद आता है मुझे।
माँ, तेरे साथ गुज़ारा
हर लम्हा याद आता है मुझे।
इन रचनाओं को भी पढ़ें–
ममता की छाया है माँ
रात भर एक करवट है माँ
पार्थ कहने वाली लड़की
कब आओगे तुम ?
माँ: जीवन आधार
माँ जैसा कोई नहीं…
ख़ुशबू माँ के साथ की

बहुत बहुत सुंदर प्रस्तुति बहना 🌹🌹🌹🙏🙏🙏❤❤❤🥰🥰🥰👌👌👌👌👌
💜💜