शब्दों में बंधा मेरा दिल

तुम्हारी लिखी हर पंक्ति ने मुझे भीतर तक छू लिया। तुम्हारे शब्दों में गंभीरता और स्त्री‑सम्मान की झलक थी। धीरे‑धीरे तुम्हारा व्यक्तित्व मेरे मन में उतर गया, और अब मुझे लगता है कि मैं तुम्हारी लेखनी की प्रेयसी बन चुकी हूँ। हर रोज़ तुम्हारा लिखा पढ़ना, मेरे लिए एक नयी दुनिया की खोज और प्रेम का अनुभव है।

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“मन की देहरी: संवेदनाओं का प्रवेशद्वार”

“‘मन की देहरी’ एक ऐसा काव्य संग्रह है जो पाठक को भीतर तक छू जाता है। पूनम सिंह जी की सरल और भावपूर्ण कविताएँ प्रेम, स्मृति और स्त्री-मन की गहराई को उजागर करती हैं। प्रत्येक पंक्ति जैसे पाठक के अपने अनुभवों का प्रतिबिंब है। एक पुस्तक जो संवेदनाओं और आत्मिक प्रेम का संसार खोलती है।”

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कृष्ण तुम ही हो…

कवि कृष्ण को सबमें और सब कुछ कृष्ण में देखता है। वे ज्ञान भी हैं और विज्ञान भी, वेद भी हैं और उपदेश भी। प्रकृति में बहती सरिता से लेकर सागर की गहराइयों तक, पेड़-पौधों की हरियाली से लेकर धरती की मुस्कान तक हर रूप में कृष्ण विराजते हैं। वे काल भी हैं और भाव भी, प्रेम की ज्वाला भी और विरह की पीड़ा भी। कभी मरहम बनकर सहलाते हैं तो कभी प्रेरणा बनकर दिशा दिखाते हैं। भजन-किर्तन में गूंजते स्वर हों या संसार की माया सब कृष्ण ही हैं, तारणहार भी वही।

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संतोष कुमार झा का कविता संग्रह “स्याही का सिपाही”

हिंदी दिवस के अवसर पर गांधीनगर, गुजरात में आयोजित 5वें अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन के दौरान कोंकण रेलवे कॉर्पोरेशन लिमिटेड (केआरसीएल) के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक संतोष कुमार झा के चौथे काव्य संग्रह “स्याही का सिपाही” का विमोचन किया गया। पुस्तक का विमोचन भारत सरकार के केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, राज्यसभा सांसद डॉ. दिनेश शर्मा, वैज्ञानिक डॉ. आनंद रंगनाथन और भारत सरकार की सचिव (राजभाषा) श्रीमती अंशुलि आर्या द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।

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डॉ. वर्षा महेश गरिमा को मिला पंडित बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार

मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद, साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित अलंकरण समारोह में सुप्रसिद्ध युवा रचनाकार डॉ. वर्षा महेश गरिमा को उनकी प्रथम कृति क्षितिज की ओर (कविता संग्रह) के लिए प्रादेशिक स्तर का पंडित बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार प्रदान किया गया.यह समारोह राजधानी भोपाल के रवीन्द्र भवन स्थित अंजनी सभागार में संपन्न हुआ, जहाँ साहित्य जगत से जुड़े अनेक विद्वान, रचनाकार और साहित्य प्रेमी उपस्थित थे.कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात खेल कमेंटेटर पद्मश्री सुनील दोषी रहे, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में संस्कृति विभाग के संचालक एन. पी. नामदेव उपस्थित थे.

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गलतफहमियांँ

गलतफहमियांँ… एक ऐसी आग जो बिना लगाए ही सब कुछ भस्म कर देती है। रिश्ते, अहसास, अरमान — सब इसकी चक्की में पिस जाते हैं। अपनों को अपनों से दूर करने वाली यही गलतफहमियांँ, जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी बन जाती हैं।

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वे पुरानी सी प्रेमिकाएं…

यह कविता उन पुरानी प्रेमिकाओं और पत्नियों को समर्पित है जिन्हें पढ़ना-लिखना भले न आता हो, पर जिन्होंने प्रेम की सबसे सुंदर अभिव्यक्तियाँ रचीं — कभी गीली मिट्टी में पैर के अंगूठे से प्रेम-पत्र उकेरकर, तो कभी पलकों के इशारे से मन की बात कहकर। उनका प्रेम किताबों में नहीं, ज़मीन पर लिखा जाता था। आज की चिकनी टाइल्स और मार्बल की ज़मीन पर वो प्रेम-पत्र कहीं दबकर खो चुके हैं। इस निश्छल, मौन, पर गहरे प्रेम को समझने के लिए शायद हमें टाइम मशीन में लौटकर जाना होगा।

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…अगर ज़िंदगी फिर से मुड़ जाए

इस कविता में एक स्त्री अपने जीवन के उस मोड़ पर खड़ी होकर गुज़रे समय को फिर से जीने की ख्वाहिश करती है — वो अधूरे सपने, वो रिश्ते, वो बचपन की अलमारी, और माँ की बातें… सब कुछ एक बार फिर सहेजने की उम्मीद लिए। यह एक आत्ममंथन है, एक नई शुरुआत की ओर बढ़ने का भावुक आह्वान।”

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