वो जो थी पुरानी
प्रेमिकाएँ और पत्नियाँ!!
उनको पढना और लिखना
कब आता था ?
वें तो बस उकेरा करती
थी पैर के अंगूठे से प्रेम !
कच्ची सी जमीं पर
देख लेती अगर जमीं नम
जमीं खुरच लिख देती
अनगिनत प्रेम पत्र
वे सब पुराने प्रेमपत्र
कहीं दबे पड़े होंगे आज …!
टाइल्स मार्बल की कठोर
जमीं में दबकर गल गये हों!
उनको पढना लिखना कब
आता था वें तो पढवाती थी
बस अपनी आँखो के इशारे !
जिन्हें पलकों पर रहती
बरसों बरस से सँवारे!!
उठाते ही पलके उकेर देती
थी सीधे दिलबर के दिल पर।
उस लिखावट को
आज के पुरुष नहीं पढ़
सकते पैर से उकेरी लिपि को
ना आज की नवयौवना लिख
पाएंगी नीची निगाह से जमीं
कुरेदकर नाम प्रियतम का !
उनको पढ़ने जाना होगा
टाइम मशीन में बैठकर।।

सुनीता सोलंकी ‘मीना’ मुजफ्फरनगर
10 पुस्तकें प्रकाशित
1- उसके बाद
2- मुझमें बेइंतहा सा शामिल
3-राह रपटीली
4- और खामोशी बोल पड़ी
5- सलमा रानी,
6- वो नजारा हमारी नजर ले गया
7- संकरात की खिचड़ी
8- बाद तेरे
9- ज़िक्र
10- शाम का तारा

धन्यवाद सर!
वाह! सच