खामोश गुलमोहर, महकती रजनीगंधा
गुलमोहर की खामोश निगाहें और रजनीगंधा की अनकही खुशबू—दो ऐसे एहसास, जिनके बीच प्रेम कभी शब्द नहीं बनता, फिर भी सब कुछ कह जाता है।

गुलमोहर की खामोश निगाहें और रजनीगंधा की अनकही खुशबू—दो ऐसे एहसास, जिनके बीच प्रेम कभी शब्द नहीं बनता, फिर भी सब कुछ कह जाता है।
यह कविता प्रेम के उस रूप को उजागर करती है जहाँ चाहने वाला टूटता है और जाने वाला वादा लेकर चला जाता है। शब्दों में ठहरा दर्द और अधूरा इंतज़ार इसकी आत्मा है।
उस शाम का मौन बहुत कुछ कह गया। आपके कहने का इंतज़ार नहीं था मुझे, क्योंकि आपकी नज़रें और आपकी ख़ामोशी ही मेरे दिल तक उतर आई थीं। वह अहसास किसी अनदेखी धारा की तरह मेरे हृदय को छूता चला गया। आसमान पर टिमटिमाते तारे हमारे साक्षी बने और हरसिंगार की महक ने आपके मन की अनकही बात मुझ तक पहुँचा दी। हम आमने-सामने थे, और ऐसा लगा जैसे हमारे दिलों के द्वार सदियों से एक-दूसरे की प्रतीक्षा कर रहे हों। दूर तक फैली चाँदनी ने हमें घेर लिया और हरसिंगार की माला ने हमारी आत्माओं को एक सूत्र में बाँध दिया। उस पल न समय का कोई बंधन था, न दूरी की कोई दीवार—बस आप थे, मैं थी और हमारा गहरा, मौन प्रेम।
कभी-कभी कुछ यादें सिर्फ प्रश्न नहीं होतीं, वे उत्तर भी नहीं होतीं—वे प्रार्थनाओं जैसी होती हैं, जो किसी के दिल की दहलीज़ पर दीप की तरह जलती रहती हैं। यह कविता नहीं, बल्कि प्रेम की उस शांत पुकार का दस्तावेज़ है जो बिना किसी आरोप या उत्तरदायित्व के, बस यादों की नम परतों में छुपा होता है। जब भी मन थक जाए, कोई मुस्कान याद आ जाए, या बारिश में घुलने की इच्छा हो, तब लौट आने की स्वीकृति देने वाली यह पुकार, प्रेम की सबसे कोमल और निस्वार्थ अभिव्यक्ति है। प्रेम, जहाँ आना जाना नहीं, बस “होना” ही काफ़ी होता है।
कुछ भावनाएँ ऐसी होती हैं जो कही नहीं जातीं, लेकिन दिल की गहराइयों में अनवरत बहती रहती हैं — सिसकती हुई, दबी हुई, फिर भी महसूस होती हुई। ये धड़कनों में छिपे वो एहसास हैं जो न पूरी तरह अव्यक्त हैं, न पूरी तरह अभिव्यक्त। दिल मानो एक ऐसा प्रयाग है जहाँ हर भावना, हर याद, हर संबंध एकत्र हो जाता है — जैसे गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम।हाल ही में जन्मे एक मासूम से इश्क़ ने मन को कुंभ की तरह भीगो दिया है — वह भी मौन में, तप में, जल में और हवा के हर स्पर्श में। तेरी उपस्थिति जैसे हर तत्व में घुल गई है। इस भावनात्मक संगम में अब प्रेम और भक्ति एकसाथ बह रहे हैं। मन जैसे प्रयागराज बनकर इंद्रियों में शंखनाद कर रहा है — बुला रहा है, कि अब इस प्रवाह में तुम भी आ जाओ।
वो सीता की तरह अग्नि परीक्षा देती है, उर्मिला की तरह प्रतीक्षा करती है, राधा की तरह वियोग को स्वीकारती है, और मीरा की तरह प्रेम में ज़हर भी अमृत मान लेती है। स्त्री का प्रेम त्याग है, मौन की पुकार है, और एक सम्पूर्ण सृष्टि है — जिसे समझने के लिए साधक बनना पड़ता है।
यह कविता उन पुरानी प्रेमिकाओं और पत्नियों को समर्पित है जिन्हें पढ़ना-लिखना भले न आता हो, पर जिन्होंने प्रेम की सबसे सुंदर अभिव्यक्तियाँ रचीं — कभी गीली मिट्टी में पैर के अंगूठे से प्रेम-पत्र उकेरकर, तो कभी पलकों के इशारे से मन की बात कहकर। उनका प्रेम किताबों में नहीं, ज़मीन पर लिखा जाता था। आज की चिकनी टाइल्स और मार्बल की ज़मीन पर वो प्रेम-पत्र कहीं दबकर खो चुके हैं। इस निश्छल, मौन, पर गहरे प्रेम को समझने के लिए शायद हमें टाइम मशीन में लौटकर जाना होगा।