वो प्रेम में थी…
इसलिए उसने सीता बनकर अग्नि परीक्षा दी,
सिर्फ़ इसलिए कि उसके प्रिय को कोई संदेह न हो।
वो उर्मिला बनी…
नींद और शृंगार को त्यागकर वर्षों तक प्रतीक्षा करती रही
बिना कोई शिकायत, बिना कोई प्रश्न।
वो अहिल्या बन गई…
जब समाज की उपेक्षा ने उसे जड़ बना डाला,
फिर भी प्रेम की आस्था को मन में जीवित रखा।
वो सावित्री बनी…
मृत्यु से लड़ गई, सिर्फ़ इसलिए कि उसके प्रेम को जीवन मिल सके।
वो राधा बनी…
प्रेम किया बिना किसी अधिकार के,
वियोग को भी पूजा की तरह अपनाया।
वो रुक्मिणी बनी…
अपने प्रेम को पा लेने के बाद भी,
हर दिन उस प्रेम को निभाया…
हर क्षण।
वो सती बनी…
जब अपमान सहा तो सबकुछ त्याग दिया —
देह तक छोड़ दी, पर प्रेम से विचलित न हुई।
वो पार्वती बनी…
जो जन्मों की तपस्या करके,
अपने प्रेम को फिर से अर्जित करने निकली।
वो द्रौपदी बनी…
जिसका चीर हरा गया,
फिर भी वो चुप न रही —
प्रेम में, सम्मान माँगने का साहस दिखाया।
वो लक्ष्मी बनी…
चरणों में बैठकर,
प्रेम में समर्पण का अर्थ दिखाया।
वो मीरा बनी…
जिसने ज़हर को भी अमृत मान पी लिया —
क्योंकि उसका प्रेम शुद्ध था, निष्कलंक था।
वो पद्मावती बनी…
जिसने प्रेम की मर्यादा के लिए
आग को भी वरमाला बना लिया।
और फिर…
तुम कहते हो —
”स्त्री प्रेम नहीं करती?”
नहीं…
वो प्रेम करती है — पर तुम उसे प्रेम समझ ही नहीं पाए।
उसके प्रेम में अधिकार नहीं,
हर त्याग समर्पित है।
उसके प्रेम में शब्द नहीं,
हर मौन पुकार है।
उसके प्रेम में तर्क नहीं,
पर पूरा ब्रह्मांड समाया है।
उसके प्रेम को समझने के लिए,
तुम्हें प्रेमी नहीं — साधक बनना होगा।
तब ही जान पाओगे —
स्त्री जब प्रेम करती है, तो सृष्टि रच देती है…
और जब टूटती है, तो इतिहास।

गरिमा भाटी “गौरी”
फ़रीदाबाद, हरियाणा
