मर्यादा पुरूषोतम
मनुष्य रूप में प्रभु श्रीराम का अवतार मर्यादा, त्याग और संघर्ष का अद्भुत संदेश देता है। प्रस्तुत कविता उसी दिव्य स्वरूप को भावपूर्ण श्रद्धांजलि है।

मनुष्य रूप में प्रभु श्रीराम का अवतार मर्यादा, त्याग और संघर्ष का अद्भुत संदेश देता है। प्रस्तुत कविता उसी दिव्य स्वरूप को भावपूर्ण श्रद्धांजलि है।
समुद्र से मिलने की चाह में बहती नदी और समुद्र के बीच का यह संवाद समर्पण, प्रेम और त्याग की गहराई को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है। नदी अपनी हर बूंद में समर्पण की मिठास लेकर समुद्र तक पहुँचती है, लेकिन समुद्र उसके सफर को समझ नहीं पाता। अंततः प्रेम का सच्चा अर्थ उसी क्षण प्रकट होता है, जब समंदर उसे अपने आगोश में समेट लेता है।
‘निःस्वार्थ प्रेम’ एक भावपूर्ण हिंदी कविता है, जो स्त्री के मौन, त्याग, धैर्य और प्रेम की गहराई को प्रकृति के सुंदर बिंबों के माध्यम से अभिव्यक्त करती है। यह कविता बताती है कि समय के साथ स्त्री शिकायतों से नहीं, बल्कि अनुभवों से परिपक्व होती है। वह जीवन की कड़वाहट को मुस्कान में बदलना जानती है, बंधनों को पीछे छोड़ देती है और प्रेम के उस रूप को संजोए रखती है, जिसमें अधिकार नहीं, केवल समर्पण होता है। कविता पाठक को प्रेम, आत्मबल और स्त्री के अंतर्मन की अनकही दुनिया से परिचित कराती है।
‘मां की खुशी’ एक मार्मिक लघु कहानी है, जो माता-पिता के त्याग, उनके अकेलेपन और समाज के डर के बीच उनकी खुशियों के अधिकार को उजागर करती है। यह कहानी रिश्तों की सच्चाई और बदलती सोच को बेहद संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती है।
यह कविता सपनों के माध्यम से माँ और संतान के रिश्ते की उस गहराई को छूती है, जहाँ प्रेम स्वार्थ नहीं बल्कि त्याग बन जाता है. महानगर की चकाचौंध के बीच यह रचना याद दिलाती है कि असली ऊर्जा माँ की आँखों में छुपी होती है, और सपनों का सच होना तभी सार्थक है जब उसमें उसकी साँसें बाकी रहें.
सीमाओं पर खड़ा सैनिक सिर्फ़ बंदूक नहीं थामे होता, वह अपने घर, अपने बच्चों की हँसी और माता-पिता की आँखों की प्रतीक्षा भी वहीं छोड़ आता है। सर्दी, गर्मी और बरसात उसके लिए मौसम नहीं, कर्तव्य की परीक्षा होते हैं। देश की शान उसके कदमों में और भारत की नींद उसकी आँखों की जाग में सुरक्षित रहती है। यही कारण है कि हर दुआ, हर नमन और हर उम्मीद सबसे पहले उसी के नाम लिखी जाती है।
सीमा ने जीवन भर सबके लिए जीते हुए यह सीखा कि माँ होना त्याग है, लेकिन आत्मसम्मान छोड़ देना किसी भी रिश्ते की अनिवार्यता नहीं है।
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर भक्ति, प्रेम और वैराग्य का अनुपम संगम देखने को मिला। पूज्य श्री सुनीलकृष्ण जी व्यास ने गोपी गीत और राजा परीक्षित जन्म प्रसंग के माध्यम से निष्काम भक्ति और भगवान की करुणा का भावपूर्ण संदेश दिया। संपूर्ण वातावरण हरि नाम और भक्तिरस से सराबोर रहा।
शैफाली सिन्हा, नवी मुंबई (महाराष्ट्र) बचपन से ही मैंनेख़ुद को पीछे रखकरसबकी सेवा की।लोग आश्वासन देते रहेइसका फल ज़रूर मिलेगा। फल की कभी चाह नहीं रही,बस कोई स्नेह सेदो मीठे बोल कह देतो वही मेरी सबसे बड़ी पूँजी बन जाते। शायद यही मेरी नियति थी,या शायद मेरा होना हीकिसी और का सहारा बनने के लिए…