gulmohar

सोने की चूड़ियां

सुमेरा को सोने की चूड़ियों का बड़ा शौक था। बचपन से ही बस यही उसका इकलौता ख़्वाब था। उसे पूरा करने के लिए वह सिलाई और ट्यूशन करके पैसे जोड़ रही थी। आज वही सारी बचत उसने भाई की मेडिकल कॉलेज की फीस के लिए बड़ी खुशी से निकाल दी।
निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार का बेटा मेडिकल की पढ़ाई करेगा यह बात अपने-आप में बहुत बड़ी थी।

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दीवारें

बेटे के नए घर की चमक-दमक देखकर भी उसके मन में बस एक ही प्रश्न गूंजता रहा.“मेरी जगह कहाँ है?” कुछ दिन रुककर लौटी तो अपने पुराने घर की दीवारें भी जैसे समझा रही थीं.“अभी थकना नहीं… तेरे हिस्से का इंतज़ार अभी बाकी है।”

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भ्रम : एक म्यान दो तलवारें

राम “और ” श्याम ” नाम रखूंगी भाभीजी – मेरे भी आंगन में किलकारी गूंजेगी , मेरी गोद से नहीं तो क्या हुआ ! छोटी की गोद से सही ।
बस, पांडे जी को खुश देखना चाहती हूं ।
अपने ही पति की सेज सजाई पंडिताइन ने – घर में किलकारी भी गूंजी …….
लेकिन अपने हाथों अपनी बगिया …

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“कंधों पर दुनिया, आँखों में समंदर”

पुरुष ज़ुबां से कम बोलते हैं, पर उनकी आँखें सब कह देती हैं. प्यार, फ़िक्र, थकान और छुपी हुई नमी। ज़िम्मेदारियों में दबे हुए भी वे घर की जड़ बनकर सबकी खुशी में खुद को भूल जाते हैं।

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कुसुम का धागा

सुबह की चाय का कप हाथ में लिए मैं अख़बार पढ़ रही थी कि एक खबर ने जैसे दिल को भीतर तक हिला दिया इंदौर में बस में छूटा नवजात शिशु, मां-बाप फरार.
खबर छोटी थी, पर असर बड़ा. कुछ पंक्तियों में लिखी उस घटना के पीछे जाने कितनी कहानियां दबी थीं. लिखा था. एक दंपत्ति बस में सवार हुए, गोद में एक नन्हा सा बच्चा था, मुश्किल से पंद्रह दिन का. थोड़ी देर बाद वे बोले कि कुछ सामान लेना है, बस से उतर गए.

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माँ एक दैवीय शक्ति

दिनभर की भागदौड़ के बाद भी जाह्नवी के मन में अपनी नन्ही बेटी की यादें बेचैनी बनकर उमड़ती रहीं। अंधेरी राहों पर अकेले चलती हुई माँ की यह यात्रा सिर्फ घर लौटने की नहीं, बल्कि मातृत्व की उस दैवीय शक्ति का प्रमाण थी जो हर बाधा को पार कर जाती है। जब मन सच्चा हो, तो ईश्वर भी मददगार बनकर रास्ते में उतर आते हैं।

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करवा चौथ

साँझ के धुँधलके में जब दीपों की कतारें आँगन को सजाती हैं, हवा में करवा चौथ का सुगंधित उत्सव घुल जाता है। थाली में सिन्दूर, करवा में भरा प्यार — सब कुछ उस एक भाव के इर्द-गिर्द घूमता है जो समय की हर परीक्षा में अडिग रहा है। चाँद निकलने से पहले ही मन अपने चाँद को निहार लेता है — वही तो उसका सहारा है, वही उसका संसार। भूख-प्यास का एहसास प्रेम की ऊष्मा में कहीं विलीन हो जाता है। करवा की लौ झिलमिलाती है, जैसे रिश्तों की डोर — अटूट, पवित्र और उजली। प्रतीक्षा में बँधी आँखों में बस एक ही नाम गूंजता है, एक ही आकांक्षा साँसों में बसती है

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मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम

श्रीराम को केवल एक राजा या नायक के रूप में नहीं, बल्कि आदर्श और जीवन-दर्शन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जिनमें मन रमा रहे, जिन्हें हमने कभी गुना नहीं, जो समय के शिलालेख पर पावन धाम हैं — वही राम हैं। उनकी मर्यादित कर्त्तव्य-बोध और कूटनीति की सूक्ष्म समझ, जीवन के रण में उनकी जीत और हार, सागर पर उनका साहस, प्रेम और त्याग — सब उन्हें न केवल नायक बल्कि नयनाभिराम बनाते हैं। उनके कार्य और आचरण हमारे जीवन में संजीवनी और अनमोल निधि की तरह हैं।

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प्रेम में पहाड़ होना

प्रेम केवल सहज अनुभव नहीं, बल्कि वह पहाड़ की तरह दृढ़ और विशाल भी हो सकता है। यह मन की गहराई से उत्पन्न होता है, तब जब शब्द भी लवों पर आने में संकोच करते हैं। प्रेम में केवल नदी या सागर की तरंगें नहीं, बल्कि वह इतनी शक्ति रखता है कि व्यक्ति पहाड़ बन जाए। यह केवल प्रेमी और प्रेमिका का रिश्ता नहीं है, बल्कि वह पीड़ा को भी अपने साथ बहा ले जाता है, सूर्य के ताप, चाँद की शीतलता, ऋषियों की तपस्या और हवन की अग्नि की तरह विस्तृत और बलिदानी होता है। प्रेम, त्याग और शिव के तांडव की भांति, कभी शांत, कभी उग्र — लेकिन हमेशा अमर और अडिग है।

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दुर्गा.. 

दया और माया दो बहनें थीं। दया माँ दुर्गा की परमभक्त थी और अपने घर का पूरा काम संभालती थी, जबकि माया और उसका पति माधो आरामतलब और चालाक थे। दया और उधो की शादी हुई और उनके घर में छः बेटियाँ थीं।
नवरात्र के दिन, दया और उधो की साधारण साधना और भक्ति के बीच, उधो ने रास्ते में एक नवजात बच्ची को पाया, जिसे दया ने अपने घर ले जाकर गोद में लिया। दया ने उसे ‘दुर्गा’ नाम दिया और बिना सामग्री के ही पूजा-अर्चना की।
कुछ दिनों में घर की हालत सुधर गई और महानवमी की रात, बच्ची अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुई। देवी दुर्गा ने माधो को उसकी क्रूरता का पाठ पढ़ाया और दया के घर को आशीर्वाद देकर पुनः खुशहाली दी।कहानी यह संदेश देती है कि **सच्ची भक्ति, मानवता और दया ही परम बल हैं**, और कन्याओं का सम्मान करना जरूरी है।

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