
रश्मि’ मृदुलिका’ देहरादून (उत्तराखंड)
जाह्नवी का आज का दिन बहुत व्यस्त रहा, दिनभर भागदौड़ रही। स्कूल में बच्चों की निबंध और कला प्रतियोगिता थी। प्रतियोगिता के आयोजन कराने में पूरा दिन निकल गया। समय का भान ही न रहा। जैसे ही छुट्टी की घंटी बजी तब ध्यान आया कि आज शनिवार है, घर जाना है।
अचानक घर पर छोटी सी बेटी का चेहरा जाह्नवी की आँखों में कौंध गया। बेचैनी बढ़ गई। अब तो घर जाने के लिए आखिरी गाड़ी निकल गई होगी। कैसे जा पाएगी? शाम होने को आई। आज नहीं जाती, अगले हफ्ते चली जाऊंगी. यही सोचकर जाना टाल दिया, लेकिन मन नहीं माना। नन्ही बिटिया इंतज़ार कर रही होगी। वह कैसे रुक सकती है! नहीं, वह ज़रूर जाएगी। उसने अपना बैग उठाया और पैदल ही चल दी।
धीरे-धीरे अँधेरा होने लगा। जंगली जानवरों के साथ जंगली इंसानों का डर सताने लगा। उसे याद था कि कैसे शिक्षक की नौकरी के लिए उसने मेहनत की थी। शिक्षक बनना उसका सपना था, इसलिए शहर से दूर गाँव में उसने शिक्षक की नौकरी खुशी से स्वीकार कर ली थी। लेकिन अपनी नन्ही सी बच्ची का चेहरा याद आते ही उसका मन ग्लानि से भर जाता, जिसे वह समय नहीं दे पा रही थी।
अचानक ही सियारों की आवाज़ों ने उसे विचारों से वास्तविक स्थिति में ला दिया। मन अनजाने डर से काँपने लगा। बेटी दरवाज़े पर टकटकी लगाए होगी। उसके कदम और तेज़ी से चलने लगे। रास्ते भर ईश्वर से प्रार्थना करने लगी। अचानक ही उसे गाड़ी के चलने की आवाज़ सुनाई दी। इस वक्त कौन हो सकता है? उसने देखा कि कोई साथी शिक्षक है। शिक्षक ने गाड़ी रोकी और उसकी तरफ देखा। उसने शिक्षक से कहा -“क्या आप मुझे भी स्टेशन तक छोड़ सकते हैं?” शिक्षक ने हामी भरी। उस शिक्षक ने कहा-“मैं इस समय कभी नहीं आता, लेकिन आज अचानक ही शहर में काम पड़ गया और मुझे आना पड़ा।”
वह सोच रही थी -यह एक माँ के दिल की आवाज़ थी जो ईश्वर तक पहुँच गई थी या बेटी की नज़रों का इंतज़ार, जो माँ के इंतज़ार में दरवाज़े पर टिकी थीं, उन्हें ईश्वर ने देख लिया था। आखिर ईश्वर का हृदय भी तो मातृत्व से भरा है। वह जल्दी से जल्दी घर पहुँचना चाहती थी। जाह्नवी ने आज उस अनजान मददगार और ईश्वर दोनों को धन्यवाद दिया। आज उसने माँ की शक्ति को अनुभव किया था।
