प्रेरक कथा
किस्मत का खेल
अपने माता-पिता को आग में खोने के बाद अरुण बिल्कुल अकेला रह गया। एक साड़ी की दुकान में काम करते हुए उसने चोरी रोककर अपने मालिक का विश्वास जीत लिया। मालिक ने उसकी ईमानदारी देखकर उसे अपनी बेटी निशा के साथ विवाह के लिए कहा। किस्मत से उजड़ा अरुण का घर फिर से बस गया, और तीनों एक खुशहाल परिवार बन गए।
माँ एक दैवीय शक्ति
दिनभर की भागदौड़ के बाद भी जाह्नवी के मन में अपनी नन्ही बेटी की यादें बेचैनी बनकर उमड़ती रहीं। अंधेरी राहों पर अकेले चलती हुई माँ की यह यात्रा सिर्फ घर लौटने की नहीं, बल्कि मातृत्व की उस दैवीय शक्ति का प्रमाण थी जो हर बाधा को पार कर जाती है। जब मन सच्चा हो, तो ईश्वर भी मददगार बनकर रास्ते में उतर आते हैं।
हस्तरेखा
मां के बहुत कहने पर उसने बाबा के सामने हथेली फैलाई। बाबा ने ध्यान से रेखाएँ देखीं और मुस्कराए
“अरे वा! बहुत सुंदर रेखाएँ हैं बिटिया, खूब सुख-संपत्ति और अच्छा पति मिलेगा।” वह अचानक बीच में बोल उठी—“विद्या की रेखा कहाँ है मेरे हाथ में, बताइए तो ज़रा?”बाबा ठिठक गए।“बिटिया, तुम्हारे नसीब में सब कुछ है, विद्या को छोड़कर।”उसकी आँखों में चमक आ गई।
