किस्मत का खेल

मीनाक्षी वर्मा, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली

अरुण सीधा-सादा लड़का था। माँ-बाप के साथ एक छोटे से मकान में रहता था। घर पिता की पेंशन से चलता था। अरुण नौकरी ढूँढ़ रहा था, पर अभी तक कोई काम नहीं मिला था।

एक दिन उस पर विपदा टूट पड़ी। अरुण घर पर नहीं था और किसी कारण से घर में आग लग गई। उसके माँ-पिता उसी में स्वाहा हो गए। अरुण पूरी तरह अकेला रह गया।

दुःख से उबरकर उसने शहर छोड़कर कहीं और नौकरी तलाशने की सोची। उसके मामा ने अपने किसी दोस्त के यहाँ उसे एक साड़ी की दुकान पर काम दिलवा दिया।
दिन में वह सेल्समैन की तरह काम करता और रात में वहीं दुकान पर सो जाता। दुकान के मालिक को भी उस पर भरोसा होने लगा था।

एक रात, जब अरुण दुकान पर सो रहा था, उसे शटर में खट-पट की आवाज़ सुनाई दी। किसी ने ताला खोलकर शटर ऊपर उठा लिया था। अरुण तुरंत छुप गया। उसने देखा कि दो लड़के अंदर आए और तिजोरी ढूँढ़ने लगे।

अरुण ने हिम्मत जुटाई और एक मोटा डंडा उठाकर उन पर हमला कर दिया। तब उनमें से एक चोर ने उस पर चाकू से वार कर दिया। अरुण की चीख सुनकर आसपास के लोग दौड़े चले आए। एक चोर भाग गया, जबकि दूसरे को लोगों ने पकड़ लिया।

दुकान के मालिक को भी खबर लगी। वह तुरंत आया और घायल अरुण को अस्पताल ले गया। अरुण की वजह से उसकी दुकान लुटने से बच गई थी, इसलिए मालिक के मन में उसके प्रति और सम्मान बढ़ गया। उसने पूरी तिमारदारी की और अरुण को अपने घर ले आया।

मालिक की एक बेटी थी निशा जो काफ़ी खूबसूरत थी।
एक दिन मालिक ने कहा- “अरुण, मेरे पास मेरी बेटी के अलावा कोई नहीं। और तुम्हारा भी अब इस दुनिया में कोई नहीं है। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी बेटी का हाथ थाम लो और मेरे कारोबार और घर को संभालो।”

अरुण शर्मिंदा-सा मुस्कुराया और बोला-“जैसा आप ठीक समझें, मुझे मंज़ूर है।”

धूमधाम से अरुण और निशा की शादी हो गई।
जिसकी दुनिया पल भर में उजड़ गई थी, उसकी ज़िंदगी फिर से बस गई थी।
तीनों एक परिवार की तरह बेहद खुश थे।

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