
“शबनम” मेहरोत्रा, कानपुर
चुनरिया हो गई मैली रे
चुनरिया हो गई मैली रे
बाबुल ने ससुराल जब भेजा,
ढेरों दिए उपदेश।
नजरियाँ हो गई मैली रे,
चुनरिया हो गई मैली रे।
मैं तो रसों में लिप्त हुई रे,
भूल गई संदेश।
डगरिया हो गई मैली रे,
चुनरिया हो गई मैली रे।
उसने संयम बतलाया था,
चुन लिया मैंने काम।
इसलिए बाबुल की दृष्टि में
हो गई रे बदनाम।
डगरिया हो गई मैली रे,
चुनरिया हो गई मैली रे।
लाज लगे, अब बाबुल घर में
लौट के कैसे जाऊँ।
पतरिया मैली हो गई रे,
चुनरिया मैली हो गई रे।
दुष्कर्मों से बही भर गई,
शबनम क्या दिखलाऊँ।
पतरिया मैली हो गई रे,
चुनरिया मैली हो गई रे।
लेखिका के बारे में-
शबनम मेहरोत्रा
हिंदी साहित्य की संवेदनशील एवं प्रतिष्ठित रचनाकार हैं। 26 अगस्त 1949 को जबलपुर (मध्य प्रदेश) में जन्मी शबनम मेहरोत्रा जी ने गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों के साथ साहित्य-साधना को निरंतर आगे बढ़ाया। उनकी रचनाओं में प्रेम, संवेदना, लोकजीवन, अध्यात्म और मानवीय मूल्यों का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियों में प्रेम पथ, भावांजली, शबनमी गीत तथा लोकगीत शामिल हैं। इसके अतिरिक्त वे अनेक साझा काव्य, ग़ज़ल, लघुकथा एवं भजन संकलनों में भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं। सरल, भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी लेखन उनकी विशिष्ट पहचान है।
